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परीक्षक एजेंसी का परीक्षण जरूरी है

परीक्षक एजेंसी यानी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी में सिर्फ लोगों को हटा भर देने से भ्रष्टाचार का पूरा भेद शायद नहीं खुल पायेगा। अब तक के घटनाक्रम तो यही संकेत दे रहे हैं कि इस एजेंसी को भी अवैध कमाई का जरिया बना लिया गया है। इसके एवज में राष्ट्रीय प्रतिभाओं को मारा जा रहा है, जो दरअसल एक राष्ट्रद्रोह किस्म का अपराध है।

बुधवार को यूजीसी-नेट परीक्षा को रद्द करना, राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) द्वारा इसके कथित सफल आयोजन” के ठीक एक दिन बाद, एजेंसी की गिरती प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला एक और कदम है। इस साल के नीट-यूजी (मेडिसिन) में अनियमितताओं और जेईई (इंजीनियरिंग) के बारे में शिकायतों के बाद, एनटीए भारी दबाव में है। कुछ मायनों में, शिक्षा मंत्रालय की कार्रवाई चल रहे नीट विवाद के प्रति उसकी प्रतिक्रिया के बिल्कुल विपरीत है, और ऐसा लगता है कि उसने कुछ सबक सीखे हैं।

इसने गृह मंत्रालय की साइबर क्राइम टीम के इनपुट के आधार पर स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई की, वह भी उम्मीदवारों की ओर से कोई औपचारिक शिकायत किए बिना, जबकि नीट मामले में इसने पेपर लीक के कई आरोपों और पुलिस शिकायतों के बावजूद समितियों और अदालती मामलों के माध्यम से अपने पैर पीछे खींच लिए।

मंत्रालय ने तुरंत यूजीसी-नेट को रद्द कर दिया और एक नई परीक्षा का वादा किया। इसने मामले की जांच सीबीआई से करने को कहा है, जबकि इसी तरह की जांच के लिए नीट उम्मीदवारों की लगातार मांग पर ध्यान नहीं दिया। खबर है कि बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई ने भी केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट भेज दी है, जिसमें प्रश्न पत्र लीक होने की पुष्टि की गयी है।

हालांकि, नौ लाख से ज़्यादा यूजीसी-नेट उम्मीदवारों के लिए, जिन्होंने महीनों तक पढ़ाई की और फिर अपने परीक्षा केंद्रों तक लंबी दूरी तय की, जिनमें से कुछ ने अपनी लागत को पूरा करने के लिए ऋण लिया, यह थोड़ी सी सांत्वना है। ये युवा जवाब के हकदार हैं, और अभी, ज़्यादातर सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं।

एक बात तो यह है कि सरकार के शिक्षा प्रतिष्ठान में किसी ने भी यह नहीं बताया है कि 2018 तक सीबीएसई द्वारा आयोजित की जाने वाली नेट एक ऑफ़लाइन परीक्षा क्यों थी, जब इसे एनटीए ने अपने अधीन कर लिया और यह एक ऑनलाइन परीक्षा बन गई, लेकिन इस साल इसे वापस ऑफ़लाइन, पेन-एंड-पेपर परीक्षा में बदल दिया गया, जिसमें पेपर लीक होने की संभावना ज़्यादा है। जैसे-जैसे जांच की जाती है, उम्मीदवारों की नज़र में एनटीए की विश्वसनीयता फिर से हासिल करने की किसी भी उम्मीद के लिए पूरी पारदर्शिता महत्वपूर्ण है।

दूसरा है जवाबदेही और दोषियों को सज़ा। सरकार को एनटीए की प्रणालियों और कर्मियों में बदलाव पर भी विचार करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस साल परीक्षाओं में तकनीकी गड़बड़ियाँ, धोखाधड़ी, पेपर लीक और प्रॉक्सी उम्मीदवार फिर से न हों। भारत के लाखों शिक्षित युवाओं और सबसे युवा मतदाताओं का भाग्य दांव पर लगा है, इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि परीक्षण एजेंसी की परेशानियाँ राजनीतिक मुद्दा बन गई हैं।

कुछ विपक्षी नेताओं ने मांग की है कि एनटीए को खत्म कर दिया जाए और प्रवेश परीक्षाओं की जिम्मेदारी राज्यों को सौंप दी जाए। इससे केंद्र सरकार की केंद्रीकरण की प्रवृत्ति पर लगाम लग सकती है, जिसके कारण बड़े पैमाने पर परीक्षाएँ होती हैं, जिन्हें दूर-दराज के देश में प्रबंधित करना कठिन होता है। हालाँकि, कुछ अखिल भारतीय परीक्षाएँ हमेशा बनी रहेंगी, और राज्यों को संकटग्रस्त परीक्षा प्रणाली की अखंडता को पुनः प्राप्त करने में केंद्र के साथ जुड़ने की आवश्यकता है।

असली सवाल ऐसी परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों की जानकारी लीक होने को लेकर है। अत्यधिक गोपनीयता का दावा करने वाले भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाये हैं कि आखिर चूक कहां पर होती है जिससे किसी गिरोह तक यह प्रश्न पहुंच जाते हैं। जाहिर सी बात है कि शीर्ष से ही कोई न कोई तो प्रश्न पत्र कहां तैयार हुए हैं अथवा क्या हैं, इसकी जानकारी गिरोह तक पहुंचाता है।

यह जांच का विषय है। राष्ट्रीय चिंता का विषय यह है कि इस व्यक्तिगत अथवा सामूहिक भ्रष्टाचार की वजह से जो योग्य छात्र प्रवेश पाने से वंचित रह जाते हैं, क्या वह राष्ट्रद्रोह नहीं है। हम अत्यंत कुशल शिक्षा व्यवस्था में इस किस्म की बीमारी डाल रहे हैं जो आने वाले दिनों में पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को ही पंगु बना सकता है। जाहिर है कि इस दिशा में कमसे कम ईमानदारी होनी चाहिए। इसका एक तरीका पूरे देश में मेडिकल की पढ़ाई का समान अवसर और स्तर के साथ साथ निजी मेडिकल कॉलेजों के आर्थिक खर्च को कम करना हो सकता है।