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झारखंड के अफसरशाही के खेल में उतरने का पेंच दूसरा

अदालत की अवमानना के अलावा भी दूसरे मामले


  • बारिश के साथ ही हवा का रुख बदला

  • सुप्रीम कोर्ट की अवमानना कौन झेलेगा

  • राजनीति में अभी दूसरी प्राथमिकता हावी


राष्ट्रीय खबर

रांचीः मॉनसून पूर्व बारिश के साथ साथ झारखंड के सत्ता के गलियारे में भी हवा बदलती हुई महसूस हो रही है। दरअसल पहले यह चर्चा तेज थी कि अब चुनाव निपटने के बाद ही राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी को बदल दिया जाएगा। इस खेल में पर्दे के पीछे से वह अफसर सबसे ज्यादा सक्रिय था जो बड़ी चालाकी से सभी राजनीतिक दलों को साधकर चल रहा है। हर बड़ा नेता उसे अपना खास मानने की गलती कर बैठते हैं। इस साजिश  का परिणाम यह हुआ कि प्रोजेक्ट भवन और पुलिस मुख्यालय में सत्ता बदलने की आहट के साथ साथ ही मौके देखकर पलटी मारने वाले भी बदलने लगे थे।

इस बीच सत्ता शीर्ष पर बदलाव की सोच के बीच कई नेताओं ने रघुवर दास के कार्यकाल की गलतियों की याद दिला दी। साथ ही किसी विधि विशेषज्ञ ने बड़े नेताओं को फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का खतरा नहीं उठाने की नसीहत दी है। बता दें कि राज्य के डीजीपी की पदस्थापना पर सुप्रीम कोर्ट का एक स्पष्ट फैसला है। इसके अलावा किसी ने यह भी साफ कर दिया कि राज्यसभा में सांसदों की खरीद का मामला पुलिस रिकार्ड में खत्म होने के बाद भी अब तक अदालत में समाप्त नहीं हुआ है।

दूसरी तरफ एक और मामला झारखंड उच्च न्यायालय के एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने दायर कर रखा है। लिहाजा किसी फैसले के कानूनी पहलुओं को पहले देख लेना जरूरी होगी। इसके बाद से ही सत्ता के गलियारे में जो हवा चल रही थी, उसकी दिशा और गति बदलने के संकेत मिल रहे हैं। अभी मंत्रिमंडल में फेरबदल बड़ा मुद्दा है और हेमंत सोरेन के जेल में होने के दौरान ऐसा कोई बड़ा फैसला राज्य सरकार को नये सिरे से परेशान कर सकता है।

आलमगीर आलम के जेल में होने की वजह से उनके सारे विभाग मुख्यमंत्री ने वापस ले लिये हैं। जोबा मांझी चूंकि पिछली सरकार में मंत्री नहीं थी इसलिए उनके सांसद बनने से वर्तमान समीकरण पर कोई प्रभाव नहीं पडेगा। लोगों का आकलन है कि कल्पना सोरेन के विजयी होने के बाद उन्हें राज्य का 12 वां मंत्री बनाकर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

जानकार बता रहे हैं कि इन तमाम समीकरणों की वजह से झारखंड के नीति निर्धारक वर्तमान में व्यूरोक्रेसी के शीर्ष पर फेरबदल कर नये सिरे से कोई परेशानी मोल लेना नहीं चाहेंगे। यह तय है कि अगर वर्तमान समीकरणों में जबरन बदलाव होता है तो यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना होगी। लिहाजा नये सिरे से कोई कानूनी पचड़ा पालना सत्ता के लिए समझदारी वाला फैसला नहीं होगा।