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बरसों रे मेघा मेघा, ईवीएम में भी बरसो

पूरे देश में भीषण गर्मी है और इसके बीच ही चुनाव का सातवां चरण जारी है। जाहिर सी बात है कि चुनावी अखाड़े में उतरने वाले पहलवान मन ही मन यही मना रहे होंगे कि सारा वोट उनके ही पक्ष में बरस जाए। ऐसी सोच जायज भी है क्योंकि आखिर सरकार बनाने की जो बात है। जिन छह चरणों के इलाके में वोट पड़ चुके हैं, वहां के लोग अब असली मेघ के बरसने की कामना कर रहे हैं।

गजब का मौसम रहा इस बार दिल्ली और नागपुर ने तो ऐसा रिकार्ड तोड़ा कि दूसरे इलाके के लोग सोचकर ही सिहर गये। भाई साहब ऐसा तो होना ही था। बीस साल पहले से चेतावनी दी जा रही थी कि जंगल कट रहे हैं और पक्के निर्माण भी प्राकृतिक तौर तरीकों के खिलाफ जा रहा है। अब नतीजा सामने दिखने लगा है।

लेकिन एक बात पर मुझे चिंता होती है कि देश में गठित वन एवं पर्यावरण विभाग की जिम्मेदारी आखिर क्या है। आईएफएस से लेकर फॉरेस्ट गार्ड तक इस विभाग में हैं। अब तो पहले की तरह नियमित तौर पर जंगल की कटाई भी कानूनन बंद है। फिर जंगल घटते क्यों जा रहे हैं। इन तमाम लोगों के वेतन पर जो कुछ जनता का पैसा खर्च हो रहा है, उसका फायदा जनता को क्यों नहीं मिल पा रहा है।

देश के अनेक स्थानों पर निजी लोगों के प्रयास से जंगल लगने की खबरें तो आती हैं पर जंगल विभाग की कोई उल्लेखनीय उपलब्धि कहीं से सुनाई नहीं देती। ऊपर से फोन लेन और छह लेन की सड़कों के निर्माण के नाम पर जो पेड़ काटे जाते हैं, उनके स्थान पर और अधिक पेड़ लगाने का काम भी नहीं होता।

देश भर के खदान इलाकों में भी खनन करने वाली कंपनियों पर भी पेड़ लगाने की जिम्मेदारी है। इसके बाद भी इन खनन क्षेत्रों में वन नहीं बढ़ता। यह टेंशन का विषय है कि हर साल जो अरबों रुपये खर्च हो रहे हैं, वह आखिर जा कहां रहा है कि जंगल घटते जाने से परेशानियां बढ़ती ही जा रही है।

इसी बात पर फिल्म गुरु का यह गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था गुलजार ने और संगीत में ढाला था ए आर रहमान ने। इसे श्रेया घोषाल ने अपना स्वर दिया था। फिल्मी पर्दे पर ऐश्वर्या राय ने गीत में चार चांद लगा दिये थे। गीत के बोल इस तरह हैं।

बरसो रे मेघा-मेघा

बरसो रे, मेघा बरसो

मीठा है कोसा है, बारिश का बोसा है

जल-थल-चल-चल

चल-चल बहता चल

गीली-गीली माटी, गीली माटी के

चल घरौंदे बनायेंगे रे

हरी भरी अम्बी, अम्बी की डाली

मिल के झूले झुलाएंगे रे

धन बैजू गजनी, हल जोते सबने

बैलों की घंटी बजी, और ताल लगे भरने

रे तैर के चली, मैं तो पार चली

पार वाले पर ले किनारे चली

रे मेघा…

नन्ना रे..

काली-काली रातें, काली रातों में

ये बदरवा बरस जायेगा

गली-गली मुझको, मेघा ढूँढेगा

और गरज के पलट जायेगा

घर आँगन अंगना, और पानी का झरना

भूल न जाना मुझे, सब पूछेंगे वरना

रे बह के चली, मैं तो बह के चली

रे कहती चली, मैं तो कहके चली

रे मेघा…

नन्ना रे…

आधुनिक विकास में अमीर और मुफ्तखोरों के यहां एसी चलाने का नया रिवाज है। कोरोना के काल को याद कीजिए जब भीषण गर्मी में लॉकडाउन होने की वजह से लोगों को गर्मी का एहसास भी बहुत कम हुआ था। वजह साफ था कि गाड़ियां कम चल रही थी और दफ्तरों में एसी भी बंद थे। इस जीवंत उदाहरण के बाद भी हम फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आये हैं यानी दुनिया जाए भांड़ में हम चैन से रह ले। अरे भइया इतना अधिक लोड है कि बार बार बिजली कटने की नौबत आ रही है। प्रकृति का अपना नियम है। इसलिए कुछ तो इस दुनिया पर रहम करो।

चुनाव अपनी जगह पर है पर लोग जिंदा रहेंगे तभी तो वोट डालेंगे। हिमालय पर इतनी तेजी से ग्लेशियर पिघल रहा है कि इस गर्मी के मौसम में हरिद्वार के घाट भी पानी में डूब जा रहे हैं। हालात को अगर हम नहीं समझेंगे तो आखिर कौन समझेगा। गनीमत है कि मॉनसून के बादल बंगाल की खाड़ी से होकर अंदर आ गये हैं।

इससे थोड़ी सी राहत मिली है पर हमेशा ऐसा ही होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। पिछले पांच दिनों की गरमी से अगर कुछ सीख मिली हो तो अपने स्तर पर जीवन शैली और विकास की परिभाषा बदलिए। पक्के मकान और पक्की सड़कें जमीन के अंदर पानी जाने से रोक रही हैं, यह स्थापित सत्य है। अब सब कुछ जानते समझते हुए भी अगर हमलोग अनजान बने रहने का ढोंग करे तो भगवान भी मदद नहीं करेगा। वइसे इस बार ईवीएम में भी अब तक कम बारिश हुई है।