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कर्मचारी महासंघ ने एसबीआई अध्यक्ष से इस्तीफा मांगा

राष्ट्रीय खबर

मुंबई:महाराष्ट्र राज्य बैंक कर्मचारी महासंघ ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील देने के लिए भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष दिनेश खेड़ा के इस्तीफे की मांग की है कि बैंक को चुनावी बांड पर जानकारी प्रदान करने के लिए जून 2024 तक का समय दिया जाए क्योंकि प्रक्रिया में समय लगता है। फेडरेशन ने कहा कि श्री खरा, जिन्हें उनकी सेवानिवृत्ति से ठीक पहले सेवा विस्तार दिया गया था, ने सबमिशन पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों की पृष्ठभूमि में बैंक को और अधिक खराब नाम और प्रसिद्धि दी है।

महाराष्ट्र राज्य बैंक कर्मचारी महासंघ के महासचिव देवीदास तुलजापुरकर ने कहा, इससे बैंक की छवि को नुकसान हुआ है और पारदर्शिता और कॉपोर्रेट प्रशासन पर बैंक की विश्वसनीयता को झटका लगा है और इसलिए एसबीआई अध्यक्ष को पद छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा, यह ज्ञात नहीं है कि क्या उन्होंने यह पद अपने आप लिया है या निदेशक मंडल को विश्वास में लिया है, जिसमें सरकार और आरबीआई के नामित व्यक्ति को भी रिकॉर्ड पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उन्होंने कहा, एसबीआई अध्यक्ष को उनके कार्यकाल के पूरा होने पर सरकार द्वारा विस्तार दिया गया था और इस प्रकार किसी भी निकाय को संदेह है कि उनका यह कार्य पारस्परिक है।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक को अतिरिक्त समय देने से इंकार कर दिया था। उसके बाद भी पूरे बैंक के शीर्ष नेतृत्व के बारे में बैंक कर्मचारी महासंघ अधिक ध्यान दे रहे हैं। बैंक के निदेशक मंडल में एक भाजपा कार्यकर्ता के होने पर भी सवाल उठ गये हैं। बैंकिंग कारोबार से जुड़े श्रमिक संगठनों के लोगों का मानना है कि देश के सबसे बड़े बैंक की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दी गयी दलील दरअसल बैंक की बदनामी है। बैंक के पास वैसे संसाधन है कि समय मांगने की याचिका दायर करने के पहले ही उसे यह जानकारी उपलब्ध कराना था। जानकारों के मुताबिक किसी सच को छिपाने के लिए ही बैंक के शीर्ष प्रबंधन ने ऐसी घटिया दलील दी है।

इस बीच चर्चा है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करते हुए भारतीय स्टेट बैंक ने चुनाव आयोग को चुनावी बॉंड से संबंधित आंकड़े उपलब्ध करा दिये हैं। सूत्रों के मानें तो बैंक ने बिना मिलान के ही सारे आंकड़े दिये हैं। शीर्ष अदालत का आदेश यह भी है कि चुनाव आयोग इन आंकड़ों को अपनी वेबसाइट के जरिए सार्वजनिक करे। ताकि इस गोपनीयता के नाम पर जनता के जिन अधिकारों का हनन हुआ है, उन्हें स्थापित किया जा सके। वैसे कई लोग मानते हैं कि इन आंकड़ों के सार्वजनिक होते ही चंदा के नाम पर औद्योगिक घरानों को दिये गये लाभ का राज भी सामने आ जाएगा।