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एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के चार पत्रकारों के खिलाफ प्राथमिकी

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी :मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने सोमवार को कहा कि राज्य सरकार ने एडिटर्स गिल्ड के सदस्यों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है जो मणिपुर राज्य में और अधिक झड़पें पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।मणिपुर में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया से जुड़े 4 पत्रकारों पर प्राथमिकी  दर्ज हुई है। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने कहा है कि एडिटर्स गिल्ड के सदस्य राज्य में हिंसा को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे थे। साथ ही मणिपुर हिंसा पर एडिटर्स गिल्ड की रिपोर्ट को झूठी और मनगढ़ंत भी करार दिया है।

मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने कहा, मैं एडिटर्स गिल्ड के सदस्यों को चेतावनी देता हूँ कि अगर वह कुछ करना चाहते हैं, तो घटनास्थल का दौरा करें। जमीनी हकीकत देखें। सभी समुदायों के प्रतिनिधियों से मिलें और फिर जो कुछ सामने आया उसे प्रकाशित करें। केवल कुछ वर्गों से मिलना और किसी निष्कर्ष पर पहुँचना अत्यंत निंदनीय है। राज्य सरकार ने एडिटर्स गिल्ड के सदस्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। ये लोग मणिपुर में और अधिक हिंसा फैलाने की कोशिश कर रहे थे। रिपोर्ट्स के अनुसार, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के सदस्यों के खिलाफ एफआईआर इंफाल के सामाजिक कार्यकर्ता एन शरत सिंह की शिकायत पर दर्ज हुई है। एफआईआर में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की सदस्य सीमा गुहा, संजय कपूर और भारत भूषण को आरोपित बनाया गया है। इन्होंने 7-10 अगस्त तक मणिपुर का दौरा कर वहाँ हुई हिंसा पर रिपोर्ट तैयार की थी। इनके अलावा एफआईआर में एडिटर्स गिल्ड की अध्यक्ष सीमा मुस्तफ़ा का भी नाम है।

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में चुराचाँदपुर जिले के एक जलते हुए घर की तस्वीर प्रकाशित की थी। इसे एक कुकी समुदाय के व्यक्ति का घर बताया था। लेकिन यह वन अधिकारी का कार्यालय था। भीड़ ने 3 मई 2023 को इसमें आग लगा दी थी। शिकायत में कहा गया है कि यह रिपोर्ट कुकी उग्रवादियों के एजेंडे को बढ़ाने के मकसद से जारी की गई थी।बता दें कि 2 सितंबर 2023 को पब्लिश की गई रिपोर्ट में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कहा था कि इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि जातीय संघर्ष के दौरान राज्य सरकार का व्यवहार पक्षपातपूर्ण था। रिपोर्ट के सारांश में मणिपुर सरकार पर की गई टिप्पणी में कहा गया है कि सरकार को जातीय संघर्ष में किसी का भी पक्ष लेने से बचना चाहिए था। लेकिन राज्य सरकार अपना कर्तव्य निभाने में विफल रही।इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि म्यांमार में तख्तापलट होने के बाद वहाँ से भागकर 4000 लोग मणिपुर आए थे। इनको लेकर सरकार ने सभी कुकी जनजातियों को अवैध अप्रवासी बता दिया था। सरकार की नीतियों के चलते कुकी समुदाय में असंतुष्टि का माहौल था।

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने सोमवार को एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की तथ्य-खोज समिति के तीन सदस्यों और उसके प्रमुख के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की निंदा की, जिन्होंने मणिपुर में जातीय हिंसा की मीडिया कवरेज की जांच की थी। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कहा, “यह राज्य में शांति बहाल करने के लिए कदम उठाने के बजाय संदेशवाहक को गोली मारने का मामला है। हम मांग करते हैं कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (ईजीआई) की अध्यक्ष सीमा मुस्तफा और तीन सदस्यों के खिलाफ एफआईआर तुरंत वापस ली जाए।

पीसीआई ने यहां एक बयान में कहा मणिपुर पुलिस ने लगभग चार महीने से जातीय संघर्ष से प्रभावित राज्य में कथित तौर पर और अधिक झड़पें पैदा करने की कोशिश करने के आरोप में चारों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। पीसीआई ने दावा किया कि मणिपुर पुलिस ने सूचना और प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ए लागू की, हालांकि इस प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। इसमें कहा गया, “यह राज्य सरकार की एक सख्त रणनीति है जो देश के शीर्ष मीडिया निकाय को डराने-धमकाने के समान है।

मणिपुर में जातीय हिंसा के मीडिया कवरेज पर अपनी रिपोर्ट में, गिल्ड ने कहा कि उत्तर पूर्वी राज्य में पत्रकारों ने एकतरफा रिपोर्ट लिखी, इंटरनेट प्रतिबंध ने एक-दूसरे के साथ संवाद करने की उनकी क्षमता को प्रभावित किया और राज्य सरकार ने इसमें पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाई। जातीय संघर्ष।रिपोर्ट में कहा गया है, “ईजीआई टीम को बताया गया था कि ऐसा इसलिए था क्योंकि वे पहले से ही अस्थिर स्थिति को और अधिक भड़काना नहीं चाहते थे।” जातीय आख्यान. रिपोर्ट में कहा गया है कि इंटरनेट निलंबित होने और संचार एवं परिवहन अव्यवस्था के कारण मीडिया को लगभग पूरी तरह से राज्य सरकार की कहानी पर निर्भर रहना पड़ा। रिपोर्ट में कहा गया है, “एन बीरेन सिंह सरकार के तहत यह कथा बहुसंख्यक मैतेई समुदाय के पूर्वाग्रहों के कारण एक संकीर्ण जातीय बन गई।