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मैं ना बोलू ना बोलू ना बोलू रे.. .. ..

मैं ना बोलूं तो कोई क्या कर लेगा। यह सवाल सही है। जब संविधान लिखा जा रहा था तो किसी ने इस संकट पर गौर भी नहीं किया था। सिर्फ मुंह खुलवाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाना पड़े, यह गलत बात है। फिर भी गनीमत है कि इसी बहाने ही सही पर लोकसभा के अंदर बोले तो। अगर अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जाता तो कोई क्या बिगाड़ लेता। आखिर साहब के पास प्रचंड बहुमत जो है।

अविश्वास प्रस्ताव का परिणाम क्या होना है, इसे तो बच्चा बच्चा जानता था लेकिन नरेंद्र मोदी मणिपुर के मुद्दे पर इतना कम बोलेंगे, इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। ऊपर से प्रकाश अंबेडकर ने नया बम फोड़ दिया है कि सारी हिंसा वहां के पहाड़ों में मौजूद प्लैटिनम के भंडार को किसी मित्र उद्योगपति को सौंपने की साजिश है। पता नहीं यह कितना सही और कितना गलत है लेकिन वहां प्लैटिनम पाया गया है, यह सच है और यह भी सच है कि इसपर अधिकार वहां के कुकी समुदायों की ग्राम सभा का है। ऐसा नियम कहता है। अब कुकी समुदाय की शर्त है कि सरकार खनन करें तो वह सहमति देंगे किसी निजी कंपनी के लिए यह सहमति नहीं देंगे।

खैर चुनाव करीब आ रहे हैं तो दोनों तरफ से दांव लगाये जाएंगे। फिर भी इतना साफ हो रहा है कि मणिपुर में कुकी आदिवासियों के साथ जो कुछ हो रहा है, उसे देश का आदिवासी समुदाय अच्छी नजरों से नहीं देख रहा है। यह भी काफी कुछ किसान आंदोलन के साथ मिलता जुलता मामला बन गया है। किसानों के कथित फायदे के लिए तीन कृषि बिल लाने के पहले ही एक उद्योगपति के बड़े बड़े अनाज भंडार पहले से ही तैयार हो गये थे। यहां प्लैटिनम के खनन का मामला पता चला तो वहां कुकी और मैतेई समुदाय के बीच हिंसक टकराव प्रारंभ हो गया। अब मजबूरी में मोदी जी को बोलना ही पड़ा तो वह इसे भी चुनावी जनसभा समझ बैठे।

इसी बात पर वर्ष 1976 में बनी फिल्म जिंदगी का यह गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था अमित खन्ना ने और संगीत में ढाला था राजेश रोशन ने। इसे लता मंगेशकर ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

मैं ना बोलू ना बोलू ना बोलू रे

ए मैं ना बोलू ना बोलू ना बोलू रे

बोले मेरा बचपन की

हो मोहे प्रीत है बचपन की

एई मैं तो डोलू रे डोलू डोलू रे

मैं ना बोलू ना बोलू ना बोलू रे

शरम से भारी अंखिया हमारी

करती बस ये बाते तुम्हारी

लाख जतन करे मेरा मन सुन सखी

कोई जादू हम पे है चलाये

मैं ना बोलू ना बोलू ना बोलू रे

एई मैं तो डोलू रे डोलू डोलू रे

जीवन सारा यूं ही गुजरा

मोरी नैया ढूंढे किनारा

संग संग पवन के

पंछी बन के

आने वाले अब तो आ भी जा

मैं ना बोलू ना बोलू ना बोलू रे

एई मैं तो डोलू रे डोलू डोलू रे

मैं ना बोलू ना बोलू ना बोलू रे

खैर अब आगे क्या होग, इस पर अटकलबाजी का दौर जारी है। संसद के सत्र को अनिश्चितकालीन अवधि के लिए स्थगित करने के दौरान जो घटनाएं हुई, उनमें सिर्फ राहुल गांधी की सदन में वापसी से सत्ता पक्ष को परेशानी है। वरना अधीर रंजन चौधर सहित कई लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है क्योंकि वे भी अप्रिय प्रश्न खड़ा कर रहे थे। अब क्या होगा, इसे भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ईडी निदेशक को मिले 15 सितंबर तक के सेवाविस्तार से जोड़कर देखना होगा।

जाहिर सी बात है कि इस दौरान अनेक विरोधी नेता, जो रास्ते का कांटा बने है, उन्हें हटाने का काम होगा। इसमें खास तौर पर झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे खनिज प्रधान राज्य आते हैं क्योंकि इसके जरिए ही सत्ता को आगे बढ़ने का रास्ता मिलता है। लेकिन झारखंड के साथ परेशानी यह है कि जब जब केंद्रीय एजेंसियां हेमंत सोरेन के करीबियों पर हाथ डालती है तो पूर्व की रघुवर दास सरकार के कारनामें सामने आ जाते है। ऊपर से जमशेदपुर के विधायक सरयू राय हैं कि अकेले सारी केंद्रीय एजेंसियों पर भारी पड़ जाते हैं।

बिहार में अपने सुशासन बाबू ने जातिगत जनगणना का दांव चलकर भाजपा को परेशान कर दिया है। उसका नतीजा क्या होगा, यह तो हर कोई समझ सकता है। इसलिए इंडिया नामक गठबंधन का गठन ही भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन गया है। अधिक सीटों वाले राज्यों में से अकेला उत्तरप्रदेश है जहां कठिन चुनौती नहीं है। वरना महाराष्ट्र से लेकर पश्चिम बंगाल तक विरोधी अगर वाकई चुनाव में एकजुट हुए तो क्या होगा, यह समझा जा सकता है।

अब अंतिम बात यह कि अगर किसी वजह से सत्ता परिवर्तन हो गया तो उन टीवी चैनलों और उनके एंकरों का क्या होग, जो सरकार के प्रचारक बने रहे हैं। अब तो यूट्यूब और फेसबुक पोस्ट भी इन चैनलों पर भारी पड़ चुके हैं।