Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
पीएम मोदी के 'दिमागी नक्सल' बयान पर किरेन रिजिजू का विपक्ष पर तीखा पलटवार रामपुरहाट टीएमसी दफ्तर में फंदे से लटके मिले पूर्व डिप्टी स्पीकर आशीष बनर्जी: सुसाइड नोट में मानसिक ... 'बिहार बन रहा पेपर लीक की राजधानी': तेजस्वी यादव का NDA सरकार पर तीखा हमला, 19 अगस्त को राजभवन मार्च... पीएम मोदी के 'दिमागी नक्सल' बयान पर BJP-कांग्रेस आमने-सामने, छिड़ा सियासी घमासान बरेली: सरकारी नौकरी का झांसा देकर रचाई शादी, विरोध पर बेल्ट से पीटा और छीने जेवर; पति समेत ससुराल वा... सुखबीर बादल पर हमले की NIA जांच की मांग: हरसिमरत कौर बादल ने गृह मंत्री अमित शाह को लिखा पत्र, बड़ी ... भिवंडी: दरगाह में इलाज के नाम पर महिला से अघोरी रस्में व प्रताड़ना; UP भागने की फिराक में था मौलवी, ... दिल्ली में पूरा हुआ 100 'अटल कैंटीन' का संकल्प: DU मेट्रो स्टेशन से 25 नई कैंटीन शुरू, मात्र ₹5 में ... रीवा में स्वास्थ्य तंत्र की लापरवाही: 2 घंटे तक नहीं पहुंची 108 एंबुलेंस, सांस लेने में तकलीफ से जूझ... खान-खनिज संशोधन बिल के खिलाफ रांची में राजद-वाम दलों का साझा मोर्चा: आर्थिक नाकेबंदी और दिल्ली घेराव...

समान नागरिक संहिता की चर्चा इस मौके पर क्यों

अचानक से देश के विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता के सम्बन्ध में एक महीने के भीतर-भीतर जन सुझाव मांगे हैं। जाहिर है कि ये सुझाव भारतीय समाज के सभी वर्गों व समुदायों के विचार जानने के लिए मांगे गये हैं। इसके बावजूद आजादी मिलने के बाद पं. जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते भारत में हिन्दू समुदाय के लोगों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू की गई।

वास्तव में उस समय यह बहुत बड़ा क्रान्तिकारी कदम था और संविधान निर्माता बाबा साहेब अम्बेडकर का सपना था क्योंकि बाबा साहेब ने स्वतन्त्र भारत के 1952 में हुए प्रथम चुनावों से पहले ही हिन्दू कोड बिल के नाम से एक विधेयक पं. नेहरू की सरकार के कानून मंत्री रहते उस समय की संसद में रख दिया था जिसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पाया था जिससे दुखी होकर बाबा साहेब ने सरकार से ही इस्तीफा दे दिया था।

1952 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी की तरफ से पं. नेहरू ने ‘हिन्दू कोड बिल’ के विभिन्न उपबन्धों को आम जनता की अदालत में मुद्दा बनाया और इन्हें चुनावी विमर्श बनाकर पेश किया। इन चुनावों में कांग्रेस की भारी पराक्रमी विजय हुई और इसके बाद हिन्दू कोड बिल को टुकड़ों में संसद में पारित कराया गया।

समान नागरिक संहिता पूरे हिन्दू समाज पर लागू की गई औऱ बहुपत्नी परंपरा को नाजायज व गैर कानूनी बना दिया गया और ऐसा करने वाले के लिए सजा का प्रावधान कानून में कर दिया गया। इसे एक प्रगतिशील कदम माना गया मगर यह प्रावधान केवल हिन्दू समाज के लिए ही किया गया और अन्य  अल्पसंख्यक समाज के लोगों के लिए उनके घरेलू धार्मिक कानूनों को ही वैध माना गया। खास कर मुस्लिम समाज के लोगों को एक समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखे जाने को उस समय भी हिन्दू महासभा व जनसंघ आदि राजनैतिक पार्टियों ने मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति बताया।

तब से यह विवाद जारी है। अब देश की राजनीतिक परिस्थितियों में उथलपुथल के बीच अचानक इस चर्चा का बाहर आना संदेह पैदा करता है। कांग्रेस के कई नेताओं ने इसके समय पर सवाल उठाया है। जाहिर है कि सरकार अपने उसी हथकंडे को आजमाना चाहती है, जिससे उसे 2014 से अब तक सफलता मिलती आयी है।

लेकिन इस बहस के बीच इसके इतिहास को भी समझना जरूरी है। 1931 में कराची शहर में कांग्रेस पार्टी का अधिवेशन हुआ था जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभ भाई पटेल ने की थी। उस समय मुसलमानों के लिए पृथक स्वतंत्र राज्य की मांग उठ रही थी। मुस्लिम लीग कांग्रेस पार्टी को हिन्दू पार्टी बता रही थी।

1931 में कराची में सरदार पटेल की सदारत में कांग्रेस ने भारत के लोगों को धार्मिक पहचान से ऊपर सभी नागरिकों को मौलिक या मानवीय अधिकार देने का प्रस्ताव पारित किया।  भारत में जिस तरह की सांस्कृतिक विविधता विभिन्न आंचलिक परिवेश से लेकर जातीय व सामुदायिक परिवेश तक विभिन्न धार्मिक विश्वासों के दायरे में  फैली हुई है उसे देखते हुए किसी भी एक धर्म के अनुयायियों तक को एक जैसे रीति-रिवाजों में बांध कर देखना गलत होगा।

हर समुदाय की विवाह पद्धति अलग-अलग देखने में आती है। इसके बावजूद आजादी मिलने के बाद पं. जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते भारत में हिन्दू समुदाय के लोगों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू की गई। अब समय समय पर इसके लिए आवाज उठती रही है जिसके पीछे का असली मकसद राजनीतिक ही है, इस पर अविश्वास करने का कोई कारण  नहीं है।

अगर अब भी यही मुद्दा फिर से चर्चा में आ रहा है तो इससे जुड़ा हुआ सवाल यह है कि पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल में मोदी सरकार ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया था। तो क्या मास्टर स्ट्रोक, विश्व गुरु और सेंगोल की स्थापना जैसे काम भी जनता को मन बदलने में नाकामयाब रहे हैं, यह बड़ा सवाल है।

महंगाई, रोजगार, किसानों की आय और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मौन धारण किये प्रधानमंत्री मंचों से तो सफाई देते हैं पर मूल मुद्दे पर बोलने से परहेज करते हैं, जो जनता को पसंद तो कतई नहीं आ रहा है।

खासकर महिला पहलवानों और किसान आंदोलनों के वक्त प्रधानमंत्री की सोच का खुलासा हो गया था। अब दिल्ली में चुनी हुई सरकार को काम करने से रोकने के लिए विशेष तौर पर अध्यादेश लाकर मोदी सरकार ने राजनीतिक मंशा पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। दूसरी तरफ महिला पहलवानों के मुद्दे पर वह जिस तरीके से चुप हैं, इसे भी देश देख रहा है। ऐसे में समान नागरिक संहिता क्या वाकई लागू होगी अथवा यह वोट लेने का नया प्रयास है, यह प्रश्न स्वाभाविक तौर पऱ उठ जाता है। जब पहले से स्थापित कानूनों के पालन में ही भाजपा की सरकार को इतनी आपत्ति है तो वह नये शगूफे से वोट हासिल करने के अलावा कोई और नागरिक कल्याण करना चाहती है, इस पर संदेह है।