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विपक्षी एकता यानी केंद्रीय एजेंसियों का भय भी

विपक्षी दल इस बात पर सहमत नहीं हैं कि प्रधानमंत्री पद का दावेदार कौन होगा। दूसरी तरफ सभी भाजपा विरोधी दल इस बात पर सहमत हैं कि मोदी सरकार अपने विरोधियों को परास्त करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है। इस शिकायत को लेकर कई विरोधी दल सुप्रीम कोर्ट भी गये थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट से उन्हें कोई मदद नहीं मिली।

इस बीच बिहार के सीएम नीतीश कुमार की पहल ने थोड़ी उम्मीद जगायी है। नीतीश कुमार ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के साथ राहुल गांधी से भी भेंट की थी। इस मुलाकात को खुद राहुल गांधी ने ऐतिहासिक पहल बताया है। इस भेंट के तुरंत बाद भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया भी सामने आयी है, जो स्वाभाविक है।

भाजपा को भी पता है कि विपक्षी दलों की एकता से उसके दोबारा सत्ता हासिल करने के अभियान में कई किस्म की परेशानियां आ सकती हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस नेताओं से मिलने के बाद नीतीश कुमार ने अपनी पहल पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी भेंट की है। यह जगजाहिर है कि केजरीवाल और कांग्रेस के रिश्ते अच्छे नहीं रहे हैं।

इस सबसे नई पार्टी और अब एक राष्ट्रीय पार्टी के गठन के वक्त से ही दोनों दलों के बीच तनाव वाली स्थिति है। लेकिन इस मुलाकात के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड के प्रमुख नीतीश कुमार की तारीफ़ की है और कहा है कि विपक्षी पार्टियों को साथ लाने की उनकी कोशिश सराहनीय है।

उन्होंने कहा है कि इस काम में वो अपना पूरा समर्थन देंगे। नीतीश से मुलाक़ात करने के बाद केजरीवाल ने कहा, देश बेहद मुश्किल दौर से गुज़र रहा है। केंद्र में मौजूद सरकार शायद आज़ादी के बाद के दौर की सबसे भ्रष्ट सरकार है। उन्होंने कहा कि स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि आम आदमी का गुज़ारा करना तक मुश्किल हो गया है।

केजरीवाल ने कहा कि आम आदमी की ज़रूरतें केंद्र सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ये बेहद ज़रूरी है कि पूरा का पूरा विपक्ष और देश साथ आए और केंद्र की सरकार को बदले। नीतीश जी विपक्षा पार्टियों को साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं। मैं पूरी तरह उनके साथ हूं। केजरीवाल से सवाल पूछा गया कि क्या वो नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री के पद के दावेदार के तौर पर देखते हैं।

इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि अभी इस बारे में बात करना मुश्किल है, वक्त आने पर इसका जवाब भी मिलेगा। लोकसभा चुनावों को एक साल का वक्त रह गया है, इस बीच नीतीश कुमार ने बीजेपी-विरोधी पार्टियों को एकजुट करने के लिए पहला क़दम उठाया है। तय कार्यक्रम के मुताबिक नीतीश कुमार अपनी तरफ से छह अन्य ऐसे दलों के नेताओं से भी मुलाकात करेंगे।

नीतीश ने कहा है कि चुनावों से पहले एक बड़ा गठबंधन बनाने के लिए वो छह पार्टियों के नेताओं से संपर्क करेंगे। इनमें से कुछ के संबंध कांग्रेस के साथ अच्छे नहीं हैं। नीतीश इस सिलसिले में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, भारत राष्ट्र समिति के चंद्रशेखर राव और समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव से बात कर सकते हैं।

इसके अलावा वो बीजू जनता दल के नवीन पटनायक और वाईएसआर कांग्रेस के वाईएस जगनमोहन रेड्डी से भी मुलाक़ात कर सकते हैं। कांग्रेस भी इस बीच कई पार्टियों के नेताओं से चर्चा करेगी और महीने भर बाद सभी विपक्षी पार्टियों की एक बैठक हो सकती है।

समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव गुरुवार को विपक्षी पार्टियों के संभावित गठबंधन में शामिल होने से जुड़े एक सवाल से बचते दिखाई दिए। एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए इंदौर पहुंचे अखिलेश से एक संवाददाता ने पूछा कि क्या उनकी पार्टी विपक्ष के गठबंधन का हिस्सा रहेगी।

इसके जवाब में अखिलेश ने कहा, ये एक बड़ा सवाल है। जनता को बदलाव चाहिए और मैं जानता हूं कि उत्तर प्रदेश की जनता इस बार बीजेपी को सत्ता से हटा देगी। इसी बयान के दोनों पहलुओं पर गौर करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि विरोधी दलों को सबसे अधिक परेशानी उनके अपने नेताओं के खिलाफ सीबीआई, इनकम टैक्स और ईडी की कार्रवाई से है।

विरोधी दल मानते हैं कि उनकी दाल में भी काफी कुछ काला है। इस वजह से केंद्रीय एजेंसियों के दबाव के आगे कई नेता टूट जाते हैं और भाजपा की वाशिंग मशीन में जाकर साफ होकर निकलते हैं। कई राज्यों में सरकार के पतन का भी यह एक कारण रहा है। दूसरी तरफ क्षेत्रीय दलों की यह भी परेशानी है कि जमीन पर कोई पकड़ नहीं होने के बाद भी हर ऐसे चुनाव के मौके पर कांग्रेस खुद ही बड़े भाई की भूमिका अदा करने लगती है। इसी वजह से कई दलों ने कांग्रेस से दूरी बना ली है। अब तो यह केंद्रीय एजेंसियों का दबाव ही है कि सभी ऐसे भाजपा विरोधी दलों को एकजुटता की चिंता हो रही है।