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अडाणी के साथ आम जनता का भविष्य भी जुड़ा है

यह पुरानी कहावत है कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो उसके आस पास के छोटे पेड़ और घास यूं ही तबाह हो जाते हैं। लेकिन दूसरी बात यह भी है कि बड़ा पेड़ गिरने के  बाद दोबारा उस हालत में उग नहीं पाता जबकि घास फिर से नमी पाकर अपने पूर्व स्थिति में लौट जाते हैं। यह सवाल अभी देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े अडाणी समूह के आर्थिक कारोबार के साथ जुड़ा हुआ है।

यह एक सहज सवाल यह है कि बड़े पतन के बाद क्या होता है? अगर अदाणी समूह की कंपनियों के बाजार मूल्य में 120 अरब डॉलर से भी अधिक की गिरावट आई है। सच यह भी है कि समूह का मूल्यांकन अभी भी 100 अरब डॉलर से अधिक है। इस राशि में अदाणी का निजी मूल्यांकन कम से कम दो तिहाई है।

ये आंकड़े लगभग हैं क्योंकि परिदृश्य तेजी से बदल रहा है और विभिन्न समायोजन को शामिल कर पाना मुश्किल होगा लेकिन अगर अदाणी संपत्ति के मामले में दुनिया के शीर्ष दो-तीन कारोबारियों या शीर्ष 20 में भी शामिल नहीं हैं तो भी वह बहुत अमीर हैं और उनके समूह का आकार अभी भी बहुत बड़ा है।

भारत सरकार और उसकी एजेंसियां बार बार यह दिलासा देने की कोशिश कर रही हैं कि इससे देश की जनता को कोई नुकसान नहीं होगा। दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां एक के बाद एक अडाणी पर प्रतिबंध लगाती जा रही है। विवाद का कारण हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट है। रिपोर्ट में उसने कहा था कि समूह 85 फीसदी तक अधिमूल्यित था।

चूंकि अनुमान 10 दिन पहले जारी किए गए थे इसलिए शेयर कीमतों में औसतन 60 फीसदी तक की कमी आई है। लेकिन इसके बावजूद समूह की कंपनियों का मूल्यांकन काफी अधिक है। उदाहरण के लिए अदाणी पावर का मूल्यांकन उसकी बुक वैल्यू का 14 गुना है। अदाणी ट्रांसमिशन का भी यही हाल है जबकि अदाणी ग्रीन एजर्नी का मूल्यांकन उसकी बुक वैल्यू का 56 गुना है।

हाल ही में अधिग्रहीत अंबुजा सीमेंट की बुक वैल्यू जरूर अपेक्षाकृत सामान्य है। उसका मूल्य और बुक अनुपात 2.1 का है। सामान्य मूल्यांकन के मानकों के मुताबिक देखें तो अदाणी के कई शेयर अभी गिरावट से काफी दूर हैं। कंपनियां बाजार पूंजीकरण के आधार पर बनती या बिखरती नहीं हैं हालांकि वे इसका लाभ नई पूंजी जुटाने में कर सकती हैं।

परंतु पूंजी को चुकता करना होता है और इसके लिए आपको मुनाफे और नकदी की जरूरत होती है। गत मार्च में अदाणी समूह की सात मूलभूत सूचीबद्ध कंपनियों का कर पूर्व लाभ 17,000 करोड़ रुपये था जो एनटीपीसी से बहुत अलग नहीं था। समूह का विदेशी कर्ज अब बाजार में बेहद सस्ते स्तर पर है और क्रेडिट रेटिंग्स में भी कमी आ सकती है। यानी कोई भी नया बॉन्ड महंगा होगा। नया बैंक ऋण भी आसानी से नहीं मिलेगा। अदाणी एंटरप्राइजेज के मामले के बाद शेयर बाजार भी किसी नए शेयर की पेशकश को आसानी से नहीं लेगा।

संक्षेप में कहें तो समूह का ध्यान अनिवार्य रूप से इस बात पर केंद्रित रहेगा कि कैसे कर्ज की मौजूदा देनदारियों का निर्वहन किया जाए ताकि वित्तीय विश्वसनीयता बरकरार रहे। नई महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं के लिए धन जुटाना तब तक रुक सकता है जब तक कि वित्तीय स्थिरता कायम नहीं हो जाती।

सीमित नकदी प्रवाह के साथ और बाजार पूंजीकरण आधे से अधिक घट जाने के बाद अदाणी समूह को भी सोच समझकर कदम उठाने होंगे। मुकेश अंबानी से तुलना की जाए तो फिलहाल वह अदाणी से अधिक धनी हैं। परंतु दोनों में अंतर यह है कि अंबानी अपना कर्ज निपटा चुके हैं इसलिए उनके पास निवेश करने के लिए नकदी उपलब्ध है।

इसलिए अदाणी द्वारा ग्रीन हाइड्रोजन का सबसे बड़ा उत्पादक और सबसे बड़ा बिजली उत्पादक बनने, सौर ऊर्जा, रक्षा और सेमीकंडक्टर आदि के क्षेत्र में बड़ी परियोजनाओं के आगमन को लेकर शायद उनके बारे में कम ही सुनने को मिले। लेकिन यह बजट के साथ जुड़ता हुआ दिखता है कि ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में सरकार ने काफी भरकम बजट का प्रावधान किया है।

बंदरगाहों, हवाई अड्डों और अन्य कारोबारों के विस्तार की तो बात ही अलग है। धीमी वृद्धि की बात करें तो इसका असर वर्तमान और गिरावट के बाद के बाजार मूल्यांकन पर पड़ने का जोखिम होता है। एक चतुर कारोबारी एक साथ कई कारोबारों के जरिये सकारात्मक वृद्धि भी हासिल कर सकता है लेकिन बाधाओं के चलते विकल्प सीमित होने की स्थिति में वह नकारात्मक स्थितियों में भी फंस सकता है।

वैसे स्पष्ट है कि यह जीवन और मृत्यु की लड़ाई नहीं है इसलिए यह गौतम अदाणी का अंत तो कतई नहीं है। अभी भी वह देश के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति हैं और उनका समूह सबसे बड़े कारोबारी समूहों में से एक है। लेकिन शुरुआती बहादुरी के बाद यकीनन अदाणी ने अपनी स्थिति का आकलन किया होगा।