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कोरोना की रोकथाम पर भाषण नहीं कार्रवाई चाहिए

कोरोना की रोकथाम के नाम पर जो नाटक हुआ, वह पूरे देश के सामने आ चुका है। संसद के भीतर मास्क पहनकर बैठने वाले संसद के बाहर बिना मास्क के नजर आये हैं। लेकिन इससे देश की चिंता समाप्त नहीं हो जाती। चूंकि चार लोगों में नये वेरियंट का संक्रमण पाया गया है। इसलिए अत्यधिक सावधानी जरूरी है।

यह अच्छी बात है कि दूसरी लहर से सीख लेते हुए पूरे देश ने न्यूनतम चिकित्सा सुविधाओं का काफी विकास कर लिया है। इस वजह से दूसरी लहर जैसी भीषण स्थिति पैदा नहीं होने जा रही है। इसके बाद भी चीन की हालत को देखते हुए सामाजिक स्तर पर सावधानी जरूरी है। अगर हम चीन की वर्तमान स्थिति पर गौर करें तो चीन में कोरोना के बीएफ.7 वेरिएंट के कारण तबाही मची हुई है। अस्पतालों में पैर रखने की जगह नहीं है। शवदाह गृह भी लाशों से भरे हुए हैं।

हालात इतने खराब हैं कि संक्रमित लोगों के इलाज के लिए दवाइयां तक नहीं मिल पा रही। बीजिंग से 70 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित चीन के औद्योगिक प्रांत हेबेई के बाझोउ शहर में काउंटी अस्पताल के बाहर एक बुखार क्लिनिक के बाहर याओ रुयान नामक महिला बेचैनी के साथ चहल-कदमी करती दिखी।

उनकी सास कोविड-19 से संक्रमित हैं और उन्हें तत्काल इलाज की जरूरत है, लेकिन सभी अस्पताल करीब-करीब भरे हुए हैं। वह अपने फोन पर चीखते हुए कहती हैं कि यहां कोई बिस्तर नहीं है। इसी तरह चीन के शवदाह गृहों में भी शवों की भरमार है।

चीन पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर कोविड-19 की लहर से जूझ रहा है और बीजिंग के दक्षिण पश्चिम में स्थित छोटे शहरों और कस्बों में स्थित अस्पतालों के आपात वार्ड जरूरत से ज्यादा भरे हुए हैं। गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) से एंबुलेंस लौट रही हैं, तो मरीजों के बेचैन रिश्तेदार बिस्तरों की तलाश कर रहे हैं।

बिस्तरों की कमी के कारण अस्पताल की बेंच और फर्श पर मरीजों को लिटाना पड़ रहा है। याओ की बुजुर्ग सास एक हफ्ते पहले कोविड-19 से संक्रमित हुई थीं, लेकिन स्थानीय अस्पताल ने कोविड मरीज नहीं लेने की बात कहकर उन्हें पड़ोस की काउंटी में भेज दिया, लेकिन वहां भी उन्हें अस्पताल मरीजों से भरे मिले और उनकी सास को जगह नहीं मिली। पिछले दो दिनों में पत्रकारों ने हुबेई प्रांत के बाओडिंग और लांगफांग स्थित छोटे शहरों और कस्बों के पांच अस्पतालों और दो शवदाह गृहों का दौरा किया।

चीन में गत नवंबर-दिसंबर में प्रतिबंधों में ढील देने के बाद कोविड-19 के अधिक प्रसार वाले क्षेत्रों में यह इलाका भी शामिल था। एक कर्मचारी के अनुसार, झूझोउ शवदाह गृह में शवदाह का काम अधिक समय तक चल रहा है, क्योंकि पिछले सप्ताह मौतों में वृद्धि से निपटने में श्रमिकों को जूझना पड़ रहा है।

अंतिम संस्कार के काम में लगे एक कर्मचारी ने अनुमान लगाया कि वह एक दिन में 20-30 शव जला रहा है, जबकि कोविड-19 उपायों में ढील दिए जाने से पहले यह संख्या केवल तीन-चार तक सीमित थी। चीन के साथ परेशानी यह भी है कि खुद को शक्तिशाली और साधन संपन्न दिखाने की चाह में वह सच भी नहीं बताया है।

वहां वास्तव में क्या हो रहा है, इस बारे में सरकार कभी भी सही जानकारी नहीं देती। इसका प्रमाण तो हमें गलवान घाटी और तवांग में सेना के टकराव के दौरान देखने को मिल चुका है। गलवान में भारतीय सेना के साथ पीएलए की टक्कर के बाद भारत ने जो खुले तौर पर स्वीकार कर लिया कि उसके बीस सैनिक मारे गये हैं। इसके काफी दिनों बाद गैर सरकारी माध्यमों से यह सूचना बाहर आयी कि दरअसल वहां अधिक संख्या में चीनी सैनिक मारे गये थे।

तवांग में फिर से मारपीट हुई तो भारतीय सैनिकों को हिसाब पता चल गया लेकिन चीन ने फिर से चुप्पी साध ली। इसलिए वहां की वास्तविक हालत क्या है, यह समझना मुश्किल नहीं है। इसलिए केंद्र सरकार को तो सबसे पहले उन उड़ानों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए, जहां से कोरोना के नये वेरियंट भारत में आ सकते हैं। फिर से कोरोना फैलने के लिए लोगों को और जागरूक और सतर्क बनाने की जरूरत है क्योंकि भारत फिर से किसी लॉकडाउन की आर्थिक मार को झेलने की स्थिति में ही नहीं है।

गनीमत है कि हर स्थान पर अब वैक्सिन का कवरेज बेहतर हो चुका है। शायद इस वजह से भी हम सुरक्षित हैं लेकिन इसके बाद भी सावधानी की सख्त आवश्यकता है। यह सावधानी सरकारी निर्देश पर नहीं बल्कि अपने अनुभवों के आधार पर लोगों को खुद ही अपनानी चाहिए। ऐसी महामारी के दौरान भी हर काम सरकार करें, यह सोच ही गलत है। सामाजिक स्तर पर एक दूसरे को सतर्क कर भी हम फिर से कोरोना लॉकडाउन को रोक सकते हैं। इसके लिए हमें सिर्फ सही सामाजिक आचरण करने की जरूरत है।