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बदलती सोच के मिजाज को पकड़ नहीं पा रही पार्टियां

आम जनता के सोचने का तौर तरीका बदल रहा है। शायद यही वजह है कि दिल्ली में अब फिर से नये मॉडल के डबल इंजन की सरकार बनने जा रही है। दरअसल पुरानी लीक पर काम करने वाली पार्टियों को इसी फेरबदल में निहित जनादेश को समझना पड़ेगा।

मामला सिर्फ अकेले दिल्ली का नहीं है। गुजरात का चुनाव परिणाम चाहे जो भी हो यह साफ हो गया है कि इस बार की चुनौती अधिक कठिन थी। इसे सही तरीके से अगर किसी ने समझा तो वह नरेंद्र मोदी ही है। उन्होंने अपना किला बचाने के लिए जी तोड़ मेहनत की है।

दूसरी तरफ भारत जोड़ो यात्रा के तौर पर केंद्र सरकार के समक्ष एक नई चुनौती खड़ी हो रही है। कांग्रेसी नेता राहुल गांधी की इस यात्रा का राजनीतिक लाभ होगा अथवा नहीं, इस सवाल का उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में है। फिर भी जनता के बीच जो मुद्दे उठाये जा रहे हैं, उसकी आंच सरकार तक पहुंच रही है, इसे समझने में कमसे कम नरेंद्र मोदी ने कोई गलती नहीं की है।

इन तमाम घटनाक्रमों से यह समझा जा सकता है कि अब जनता को परिणामों की उम्मीद होने लगी है। सिर्फ आश्वासनों से जनता बहुत अधिक दिनों तक इंतजार करने की स्थिति में नहीं है, उसे अपने लिए काम करने वाली सरकार की परख होने लगी है। साथ ही वह चुनावी वादों और जुमलों के बीच अपना हित देख रही है। श्री मोदी ने मुफ्त की रेवड़ी की जो बात कही थी,  वह अब जनता के गले से नहीं उतर रही है क्योंकि उसके सामने सरकारी काम काज का एक दूसरा उदाहरण मौजूद है।

लोगों को सिर्फ आश्वासन नहीं काम करने की इच्छाशक्ति की परख भी होने लगी है। इसका एक असर यह होगा कि अब क्षेत्रीय दलों को भी अपने अपने इलाके में काम कर दिखाना होगा। धीरे धीरे जातिगत समीकरणों अथवा धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर वोट हासिल करने की तकनीक अब पुरानी और बेकार नजर आने लगी है।

अब जनता को सही और गलत की पहचान करने का राजनीतिक अनुभव भी शायद हो चुका है। इसी वजह से चुनाव के माहौल में सत्येंद्र जैन, मनीष सिसोदिया और सुकेश चंद्रशेखर का मुद्दा भी जनता को अपने फैसले से डिगा नहीं पाया। इस बात को भी समझना होगा कि दिल्ली के घटनाक्रमों का असर भी पूरे देश पर पड़ता है। वहां की चुनी हुई सरकार के काम काज पर अड़ंगा लगाने का भाजपा का प्रयास बैकफायर कर गया है, इसे भाजपा जितनी जल्दी समझ ले, उसी में उसकी भलाई है।

दूसरी तरफ कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी को भी अब यह सोचना पड़ रहा है कि जनता के बीच अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने के लिए उसे नये सिरे से प्रयास करने की जरूरत है। वरना पहले के स्थापित नेता अब जनता के बीच कितने लोकप्रिय रह गये हैं, यह तो कई बार के चुनाव परिणामों से साफ हो रहा है। वैसे अगर हिमाचल प्रदेश से कांग्रेस को कोई मदद मिले तो उसका असर आस पास के राज्यो पर पड़ेगा, इसकी उम्मीद की जा सकती है।

फिर भी अब यह स्पष्ट है कि अन्ना आंदोलन के रामलीला मैदान से जो असंतोष उपजा था, वह अब दावानल बनकर देश में फैल रहा है। इससे बचना सिर्फ वादों के भरोसे संभव नहीं रहा है। एक नये दल ने दूसरों को इस बात के लिए मजबूर कर दिया है कि वे भी अब शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे पर सकारात्मक बात करें।

इसके पहले तो एक दूसरे पर कीचड़ उछालने तक ही भारतीय चुनावी राजनीति सीमित हो गयी थी। अपवाद सिर्फ मध्यप्रदेश में कमलनात का मुख्यमंत्री बनना है, जिन्होंने अपने वादे के मुताबिक सत्ता में आते ही किसानों की कर्जमाफी का काम प्रारंभ किया था। यह अलग बात है कि वह भी ऑपरेशन लोटस के दबाव को समय रहते नहीं भांप पाये। फिर भी इस तरीके से सत्ता हथियाने की तकनीक आने वाले दिनों में फिर से कारगर होगी, इसकी बहुत कम उम्मीद है।

राजनीतिक नेताओं को अब सोच समझकर बोलने की मजबूरी भी समझ में आ चुकी होगी। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के मुद्दे पर जिस भाजपा ने कभी आसमान सर पर उठा रखा था, आज वे मुद्दे ही उसे परेशान कर रहे हैं। हर व्यक्ति के बैंक खाते में पंद्रह लाख देने का जुमला चुनावी चर्चा का विषय बना हुआ है। इसलिए चुनाव परिणाम चाहे जो भी हो लेकिन यह स्पष्ट जनादेश है कि अब जनता को अपने लिए काम करने वाली पार्टी ही पसंद है। सिर्फ पुराने समीकरणों पर बार बार गंगा नहाने का काम अब शायद आगे जारी नहीं रह पायेगा। साथ ही यह भी स्पष्ट होता जा रहा है कि देश में तीसरे विकल्प की उम्मीद अभी बाकी है। दो दलों के बीच का चुनाव आने वाले दिनों में शायद इसी तीसरी ताकत को अधिक मजबूत करेगा, जिसमें क्षेत्रीय दल भी शामिल होंगे।