यमन की सेना और हूतियों के बीच संघर्ष और तेज हो गया
अदनः यमन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकारी बलों और हूती विद्रोहियों के बीच जारी संघर्ष का केंद्र अब उत्तरी प्रांत अल-जौफ बन गया है। इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण प्रांत पर नियंत्रण हासिल करने के लिए यमनी सरकारी सेना ने अपने सहयोगी बलों के साथ मिलकर एक बड़ा जवाबी हमला शुरू किया है। इस सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य प्रांतीय राजधानी अल-हज्म के पूर्व में स्थित रणनीतिक पहाड़ियों पर फिर से कब्जा जमाना है। यह कार्रवाई सरकार द्वारा पिछले महीने शुरू किए गए ऑपरेशन डॉन ऑफ यमन का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य हूतियों द्वारा कब्जाए गए क्षेत्रों को वापस लेना और देश में सरकारी नियंत्रण बहाल करना है।
रणनीतिक महत्व और सुरक्षात्मक दीवार सऊदी अरब की सीमा से सटे अल-जौफ प्रांत का महत्व इसलिए अत्यधिक है क्योंकि यह हद्रमौत, सादा, सना, अमरान और तेल समृद्ध मारिब जैसे पांच प्रमुख प्रांतों से सीधे भौगोलिक रूप से जुड़ा हुआ है। यह प्रांत सरकारी नियंत्रण वाले मारिब के लिए एक सुरक्षात्मक ढाल का काम करता है और राजधानी सना के लिए पूर्वी द्वार माना जाता है।
फील्ड कमांडर कर्नल रबी अल-कुरैशी ने बताया कि सरकारी बलों ने अल-हज्म शहर के पूर्व में स्थित रणनीतिक हुवैशान पर्वत श्रृंखला पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया है। यह हूतियों की रक्षात्मक रेखा थी, जिसके टूटने से विद्रोहियों के आपूर्ति मार्गों में बाधा उत्पन्न होगी और सना के पूर्वी प्रवेश द्वार अपर अल-लबनात शिविर की घेराबंदी मजबूत होगी।
सैन्य विश्लेषक अली अल-दहब के अनुसार, इन ऊंचाई वाले इलाकों पर कब्जा करने से सरकारी बलों को रणनीतिक बढ़त और मनोवैज्ञानिक लाभ मिला है, जिससे हूतियों के फैसलों में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। जनजातीय प्रभाव और नई कमान प्रांत के लगभग 82 प्रतिशत रेगिस्तानी हिस्से (खब्ब वा अश शाफ) पर सरकार का कब्जा है, जबकि प्रांतीय राजधानी अल-हज्म सहित 10 जिलों पर हूतियों का नियंत्रण है।
इस बीच, प्रेसिडेंशियल काउंसिल ने मेजर जनरल अमीन अली अल-अकिमी को अल-जौफ का नया गवर्नर और सैन्य कमांडर नियुक्त किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि डहाम बकील जनजाति की धू हुसैन शाखा से ताल्लुक रखने वाले अल-अकिमी का मजबूत जनजातीय और सैन्य प्रभाव स्थानीय कबीलों को एकजुट करने और युद्ध के मैदान में बढ़त हासिल करने में अहम भूमिका निभाएगा।