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तांत्रिक रामचरण की पूजा 432 वर्षों लगातार जारी है

जमींदार की खोई हुई स्वर्णमुद्राओँ से जुड़ा है पूजा का इतिहास

जमींदार के लुटने की घटना से जुड़ी

स्वर्णमुद्राओँ से जमींदारी बचा ली थी

दान की जमीन पर ही पूजा होने लगी

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः लगभग चार सौ साल पहले दक्षिण 24 परगना का क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था। पक्की सड़कों के अभाव में आवागमन का मुख्य जरिया आदि गंगा का जलमार्ग था, जिससे व्यापारी और जमींदार यात्रा करते थे। इसी दौर में दक्षिण बारसात की भूमि पर प्रसिद्ध तांत्रिक रामचरण भट्टाचार्य ने अपनी साधना भूमि स्थापित की। परिवार के अनुसार, वर्ष 1593 में तांत्रिक रामचरण भट्टाचार्य ने ही इस ऐतिहासिक दुर्गापूजा की नींव रखी थी।

इस पूजा की शुरुआत से एक अनोखी लोक-कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि एक जमींदार राजा को कर (राजस्व) चुकाने के लिए भारी मात्रा में स्वर्णमुद्राएँ लेकर जा रहा था, जिन्हें डाकुओं ने घने जंगल में लूट लिया। कर न चुका पाने पर अपनी जमींदारी छिन जाने के भय से लाचार जमींदार ने तांत्रिक रामचरण भट्टाचार्य से मदद मांगी। रामचरण ने अपनी तंत्र साधना के बल पर लूटी गई मुद्राओं का पता एक विशेष पेड़ के नीचे बताया। जमींदार ने बताए गए स्थान से अपनी स्वर्णमुद्राएँ सकुशल बरामद कर लीं और राजा का कर चुकाकर अपनी जमींदारी बचा ली।

इस चमत्कार से अभिभूत होकर कृतज्ञ जमींदार ने अपनी जमींदारी का एक हिस्सा रामचरण भट्टाचार्य को दान में दे दिया। इसी दान में मिली भूमि पर रामचरण ने अपने आवास और साधना केंद्र का निर्माण कराया। 1593 में उन्होंने स्वयं अपने हाथों से दुर्गा प्रतिमा का निर्माण कर तंत्र पद्धति से देवी दुर्गा की पूजा शुरू की। उन्होंने पूजा के नियम, मंत्र और अनुष्ठानों को एक प्राचीन पांडुलिपि में दर्ज कर दिया था, जिसका पालन परिवार की आने वाली पीढ़ियाँ आज भी निष्ठापूर्वक कर रही हैं।

समय के साथ इस परंपरा में कुछ बदलाव भी आए। पूर्व में जहाँ बलि और आमिष (मांसाहारी) भोग का प्रचलन था, वहीं अब सप्तमी, अष्टमी और नवमी को केवल सात्विक एवं निरामिष भोग ही अर्पित किया जाता है, जिसे सैकड़ों श्रद्धालु ग्रहण करते हैं।

आगे चलकर परिवार के एक मेधावी सदस्य आशुतोष भट्टाचार्य, जिन्होंने कोलकाता के संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य के रूप में ख्याति प्राप्त की, उन्हें शास्त्री और महामहोपाध्याय की उपाधि मिली। इसके बाद भट्टाचार्य परिवार को शास्त्री परिवार के नाम से जाना जाने लगा और इस पूजा का नाम भी शास्त्री परिवार की दुर्गापूजा हो गया। 432 वर्षों की यह पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न होकर तांत्रिक परंपरा, जनश्रुतियों और पारिवारिक विरासत का एक जीवंत दस्तावेज है।