युवाओँ के नाराजगी भरे नारों से बीच जूझती देश की राजनीति
पत्रकारों पर भी पाबंदी आखिर क्या
आक्रोश, असंतोष और लोकतंत्र की चाह
इतने सुरक्षाबल पहले कभी तैनात नहीं हुए
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः लाठियों, बैरिकेड्स, बर्बरता, प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच एक निरंतर संघर्ष के बाद, कनॉट प्लेस को एक नई पहचान मिली है। सोमवार को दिल्ली पुलिस द्वारा लुटियंस दिल्ली में जंतर-मंतर को एक निर्दिष्ट विरोध स्थल (डेजिग्नेटेड प्रोटेक्ट वेन्यू) की सूची से हटाकर गैर-अधिसूचित (डी-नोटिफाई) कर दिया गया। इसके बावजूद असंतुष्ट और आक्रोशित जनसमूह ने इस क्षेत्र तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल पर एक अमिट छाप छोड़ दी है।
10 अक्टूबर से ही, देश की राजधानी के राजनीतिक और सत्ता के गलियारे मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आक्रोश से भर गए। यह विरोध प्रदर्शन विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन – एसआईआर) के तहत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के संबंध में निर्वाचन आयोग की भूमिका को लेकर था। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर मतदाता सूची से अनुचित तरीके से मतदाताओं को बाहर करने और चुनावी निष्पक्षता को कमजोर करने का सीधा आरोप लगाया है।
यद्यपि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा और विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अपना रुख स्पष्ट करने के लिए अलग-अलग विरोध प्रदर्शन के आह्वान किए गए थे, लेकिन धरातल पर विभिन्न राजनीतिक समूहों के बीच की रेखाएं पूरी तरह से धुंधली होती दिखाई दीं।
अपने साथ हुए अन्यायों के प्रति गहरी नाराजगी और अपने अधिकारों की बहाली की इच्छा से प्रेरित होकर, विभिन्न समुदायों और राजनीतिक दलों से जुड़े हजारों लोग नई दिल्ली के मध्य भाग में एकजुट होते नजर आए।
10 अक्टूबर को जैसे ही पत्रकार, प्रदर्शनकारी और सीजेपी के इस आह्वान के समर्थन में खड़े लोग जंतर-मंतर पहुँचे या पहुँचने की कोशिश करने लगे, उनका सामना सुरक्षा बलों के विशाल जनसैलाब से हुआ। इसमें दिल्ली पुलिस, हरियाणा पुलिस, उत्तर प्रदेश पुलिस, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) और यहाँ तक कि सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के अनुमानित 40,000 से अधिक सशस्त्र बल कर्मी तैनात थे।
और बलकर्मियों की इस भारी संख्या ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक कठोरता और बर्बरता बरती—प्रेस कार्ड पहने हुए साफ तौर पर पहचाने जाने योग्य पत्रकारों को हिरासत में लेने से लेकर मुख्य रूप से शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल प्रदर्शनकारियों को लाठियों से पीटने और प्रताड़ित करने तक, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सुरक्षा बलों के प्रयास विरोध प्रदर्शनों और मीडिया कवरेज दोनों को दबाने और कुचलने पर केंद्रित थे।
लेकिन राजधानी के मध्य क्षेत्र पर कड़े क्षेत्रीय और संचार प्रतिबंधों के बावजूद, कई नागरिकों ने बैरिकेड्स फांदे, रात भर सड़कों पर डेरा डाला, और दर्दनाक चोटों व घावों को सहा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके वोटों के मूल्य के लिए उठाई गई उनकी आवाज सुनी जाए।
नोएडा की एक प्रदर्शनकारी निशा एस. ने अपनी 19 साल की बेटी को यह दिखाने के लिए कि असली लोकतंत्र कैसा होता है, कनॉट प्लेस में अपनी कार में ही रात बिताई। उन्होंने कहा, हम यहाँ 9 अक्टूबर की रात से ही मौजूद थे, हम कार में सोए ताकि सीजेपी के विरोध प्रदर्शन में समय पर शामिल हो सकें। लेकिन दुख की बात यह है कि पुलिस द्वारा पकड़े गए बिना हम थोड़ा सा भी हिल-डुल नहीं सकते हैं। इन्हीं कारणों से अब लोग नरेंद्र मोदी के भाषणों और दिल्ली की सड़कों पर दिख रहे इंतजाम का फर्क महसूस कर पा रहे हैं।