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कैंसर के ईलाज में वैज्ञानिकों ने नई सफलता हासिल की, देखें वीडियो

एमआरएनए वैक्सिन का ट्रायल लगातार कामयाब

यह वैक्सीन कैसे काम करती है

पारंपरिक ईलाज के साइड एफेक्ट्स

डीएनए आधारित वैक्सीन बनती है

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः चिकित्सा और स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए वैज्ञानिकों ने व्यक्तिगत एमआरएनए कैंसर वैक्सीन के तीसरे चरण के क्लिनिकल ट्रायल्स में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। दशकों के गहन शोध के बाद, यह क्रांतिकारी तकनीक अब कैंसर के इलाज को पूरी तरह से बदलने की राह पर है।

पारंपरिक कैंसर उपचार—जैसे कि कीमोथेरेपी और रेडिएशन—शरीर की स्वस्थ और कैंसरग्रस्त दोनों प्रकार की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाते हैं, जिससे मरीजों को गंभीर दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है। इसके विपरीत, पर्सनलाइज्ड एमआरएनए वैक्सीन मरीज के अपने शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर से लड़ने के लिए प्रशिक्षित करती है। ट्यूमर की प्रोफाइलिंग: सबसे पहले मरीज के ट्यूमर का सैंपल लेकर उसके डीएनए का विस्तृत अनुक्रमण किया जाता है।

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एआई और उन्नत एल्गोरिदम की मदद से ट्यूमर में मौजूद विशिष्ट म्यूटेशन की पहचान की जाती है, जो केवल कैंसर कोशिकाओं में पाए जाते हैं। इस जानकारी के आधार पर प्रत्येक मरीज के लिए एक विशेष एमआरएनए वैक्सीन तैयार की जाती है। जब यह वैक्सीन मरीज को दी जाती है, तो यह शरीर के इम्यून सिस्टम को केवल उन्हीं विशिष्ट कैंसर कोशिकाओं को ढूंढकर नष्ट करने का निर्देश देती है।

हालिया क्लिनिकल ट्रायल्स में इस वैक्सीन का इस्तेमाल मुख्य रूप से मेलेनोमा (त्वचा का गंभीर कैंसर) और अग्नाशय कैंसर के मरीजों पर किया गया। परिणामों में देखा गया कि सर्जरी के बाद इस वैक्सीन को दिए जाने से कैंसर के दोबारा लौटने के जोखिम में 40 से 50 प्रतिशत तक की गिरावट आई है।

यह तकनीक न केवल कैंसर के इलाज की प्रभावशीलता को बढ़ाती है, बल्कि कैंसर के पुनरावृत्ति के खतरे को भी न्यूनतम करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में इस तकनीक का उपयोग फेफड़ों, स्तन और आंतों के कैंसर के इलाज के लिए भी किया जा सकेगा, जिससे यह वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी।

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