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सरकार असमर्थ हैं तो चीन से मदद लेंगेः तंगखुल

नाराज नागा समूहों ने अब भारत की चिंता बढ़ा दी

लगातार हो रही हत्याओं से नाराजगी

तंगखुल समुदाय एक प्रभावशाली समूह

अब तक हिंसा पर काबू नहीं पाया गया

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटीः उत्तर पूर्व भारत के संवेदनशील और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य मणिपुर से एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर राजनीतिक बयान सामने आया है। नागा समुदाय के प्रमुख उप-समूहों में शामिल तंगखुल समुदाय के एक प्रभावशाली निकाय ने सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था को खुली चेतावनी दी है।

संगठन का कहना है कि यदि राज्य सरकार और केंद्र सरकार मिलकर क्षेत्र के मूल और स्वदेशी (इंडीजीनियस) लोगों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहती हैं, तो वे अपनी सुरक्षा और अस्तित्व को बचाने के लिए पड़ोसी देश चीन से सहायता मांगने पर विचार कर सकते हैं। इस बयान के सामने आने के बाद देश की सुरक्षा एजेंसियों और राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल मच गई है।

तंगखुल निकाय के पदाधिकारियों ने यह तीखी प्रतिक्रिया मणिपुर में लंबे समय से चल रहे जातीय संघर्ष, विस्थापन और सुरक्षा संकट के परिप्रेक्ष्य में दी है। उनका आरोप है कि वर्तमान व्यवस्था और सरकारें स्थानीय मूल निवासियों की जान-माल और उनकी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही हैं। पिछले कुछ समय से पूर्वोत्तर के इन पहाड़ी इलाकों में विभिन्न समुदायों के बीच आपसी तनाव और सुरक्षा बलों के साथ टकराव की स्थितियां लगातार बनी हुई हैं। ऐसे में स्थानीय लोगों का एक बड़े वर्ग का यह मानना है कि उनकी पुश्तैनी जमीन, अधिकारों और जीवन की सुरक्षा के लिए जो प्रशासनिक कदम उठाए जाने चाहिए थे, वे नाकाफी साबित हो रहे हैं।

इस तरह के संवेदनशील बयान को राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीति के नजरिए से बेहद खतरनाक माना जा रहा है। भारत विरोधी या विदेशी ताकतों, विशेषकर चीन का नाम लेकर इस प्रकार की बात कहना भारतीय संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

रक्षा और कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि भले ही यह बयान स्थानीय निराशा, उपेक्षा की भावना और आक्रोश का परिणाम हो, लेकिन इस तरह की भाषा का प्रयोग क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरे की घंटी है। केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन के नीति निर्माताओं के लिए यह आत्ममंथन करने का विषय है कि पूर्वोत्तर के दूरदराज इलाकों में स्थानीय समुदाय खुद को इतना असुरक्षित क्यों महसूस कर रहे हैं।

इस बयान के आने के बाद से राजनीतिक दलों के बीच भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। विपक्षी दल जहां केंद्र और राज्य की डबल इंजन सरकारों की विफलता पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। विश्लेषकों का सुझाव है कि सरकार को तुरंत इस मामले का संज्ञान लेते हुए तंगखुल समुदाय और अन्य स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के साथ उच्च स्तरीय बातचीत शुरू करनी चाहिए। उनकी जायज चिंताओं को दूर करके और उन्हें मुख्यधारा का विश्वास दिलाकर ही इस प्रकार के अलगाववादी या चरम बयानों पर लगाम लगाई जा सकती है।