बंबई उच्च न्यायालय का अब चुनाव आयोग पर कड़ा रुख
कानून से ऊपर कोई भी नहीं है
साफ्टवेयर क्यों इसे नियंत्रित करेगा
पूरी एसआईआर व्यवस्था ही दोषपूर्ण
राष्ट्रीय खबर
मुंबईः बंबई उच्च न्यायालय ने बुधवार को चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) प्रक्रिया पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि वह इससे बेहद परेशान है। न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित जमसांडेकर की खंडपीठ ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियमों के प्रावधानों का हवाला देते हुए चुनाव आयोग से तीखे सवाल किए। अदालत ने कहा कि एसआईआर ने वास्तव में पूरी व्यवस्था को निलंबित कर दिया है। यह धारा 22 और नियम 21ए सहित सभी कानूनों को नजरअंदाज कर केवल सॉफ्टवेयर के निर्देशों का पालन करने को कहता है, जो किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है।
यह मामला सांता क्रूज़ के एक ही परिवार के छह सदस्यों द्वारा उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने के बाद सुनवाई के लिए आया था। एसआईआर प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन क्षेत्र के भीतर ही एक हिस्से से दूसरे हिस्से में पता बदलने के लिए फॉर्म-8 भरने के बावजूद इन सभी के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। अदालत ने पूछा कि बिना सुनवाई का अवसर दिए किसी का नाम हटाने का अधिकार अधिनियम में कहाँ दिया गया है? यदि किसी का नाम सूची से बाहर करना है, तो पहले उसे अपनी बात रखने का अवसर देना अनिवार्य है। साथ ही, अदालत ने संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) को भी व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहने का निर्देश दिया।
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील गौरिश अग्नि ने अदालत को बताया कि एसआईआर अवधि के दौरान सिस्टम फॉर्म-8 को प्रोसेस करने की अनुमति नहीं देता था, जिसके कारण उनके नाम हट गए। इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए अदालत ने कहा कि कानून और नियमों को ताक पर रखकर केवल टेक्नोलॉजी के इशारे पर काम नहीं किया जा सकता।
ईआरओ के पास सॉफ्टवेयर का पूरा नियंत्रण होना चाहिए, न कि वह साफ्टवेयर के निर्देशों पर पूरी तरह लाचार और निर्भर हो। अदालत ने जोर देकर कहा कि तकनीक कानून के अधीन होनी चाहिए और चुनाव आयोग का यह मुख्य दायित्व है कि कोई भी वैध मतदाता सूची से छूट न पाए।
खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई भी प्रक्रिया वैधानिक प्रावधानों को ओवरराइड नहीं कर सकती और बिना किसी को सुने नाम काटा जाना कानून के खिलाफ है। अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि जो लोग अदालत तक नहीं पहुँच पाए हैं, ऐसे अन्य मतदाताओं की वास्तविक संख्या कितनी होगी।