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उष्णकटिबंधीय पेड़ों के क्रमिक विकास का अनूठा तरीका

सूखे और भीषण गर्मी से निपटने का खुद ही इंतजाम कर लिया

अपनी जीवनशैली ही बदल ली है पेड़ ने

प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बदल ही है

क्रैसुलसियन एसिड मेटाबॉलिज्म है यह

राष्ट्रीय खबर

रांचीः प्रकृति ने पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए हर जीव और वनस्पति को अद्भुत और असाधारण क्षमताएं प्रदान की हैं। जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन का संकट गहराता जा रहा है और ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान लगातार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पेड़-पौधों के सामने अस्तित्व का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

हाल ही में वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ताओं के एक दल ने उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) क्षेत्रों के पेड़ों से जुड़ा एक बेहद रोचक, क्रांतिकारी और प्रेरणादायक रहस्य उजागर किया है। बढ़ती गर्मी, लंबे समय तक पड़ने वाले सूखे और पानी की भारी किल्लत से निपटने के लिए इन विशेष पेड़ों ने अपनी जीवन शैली में एक ऐसा अदभुत जैविक बदलाव किया है जो वैज्ञानिकों को भी हैरान कर रहा है।

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पारंपरिक रूप से अधिकांश पौधे दिन के समय सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपनी पत्तियों के सूक्ष्म छिद्रों, जिन्हें स्टोमेटा या रंध्र कहा जाता है, को खोलते हैं ताकि वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अंदर अवशोषित किया जा सके और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को अंजाम दिया जा सके।

हालांकि, इस प्राकृतिक प्रक्रिया का एक बहुत बड़ा नकारात्मक पहलू यह है कि जब तेज धूप और भीषण गर्मी पड़ती है, तो पत्तियों के इन खुले छिद्रों से वाष्पोत्सर्जन की दर बहुत अधिक बढ़ जाती है, जिसके कारण पौधों के भीतर मौजूद जीवनदायी पानी तेजी से वाष्प बनकर आसमान में उड़ जाता है। अत्यधिक शुष्क और गर्म परिस्थितियों में यह पानी की कमी पौधों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है और वे सूखकर नष्ट हो सकते हैं।

इस गंभीर पारिस्थितिक समस्या से पार पाने के लिए, क्लूसिया और कुछ अन्य विशेष उष्णकटिबंधीय प्रजातियों के पेड़ों ने क्रैसुलसियन एसिड मेटाबॉलिज्म नामक एक उन्नत, अनूठी और अत्यधिक प्रभावी प्रणाली को पूरी तरह से अपना लिया है। इसके तहत ये पेड़ कड़ाके की धूप और चिलचिलाती गर्मी वाले दिन के समय अपने सूक्ष्म रंध्रों को पूरी तरह से बंद रखते हैं। रंध्रों के बंद रहने से उनके आंतरिक ऊतकों में मौजूद नमी और पानी का एक भी बूंद वाष्प बनकर बाहर नहीं निकल पाता है, जिससे वे भीषण सूखे के थपेड़ों को आसानी से सहन कर लेते हैं।

इसके विपरीत, जैसे ही शाम ढलती है और रात का शांत, ठंडा वातावरण शुरू होता है, तथा वायुमंडल में आर्द्रता बढ़ती है, ये पेड़ अपने रंध्रों को खोलते हैं। रात के वक्त जब पानी के वाष्प बनने का खतरा न के बराबर होता है, ये पौधे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और उसे रासायनिक रूप में मैलिक एसिड के रूप में अपनी पत्तियों के भीतर सुरक्षित रूप से जमा कर लेते हैं। जैसे ही अगली सुबह सूर्य की पहली किरणें धरती पर आती हैं, ये पौधे रात में संचित किए गए उसी कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके बिना रंध्रों को खोले आंतरिक रूप से प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कर लेते हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि पौधों की यह अदभुत और लचीली अनुकूलन क्षमता भविष्य में कृषि विज्ञान और खाद्य सुरक्षा के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। इस प्राकृतिक और अनोखे जैविक तंत्र का गहन आनुवंशिक अध्ययन करके, कृषि वैज्ञानिक भविष्य में ऐसी उन्नत फसलों और अनाजों की किस्मों का विकास कर सकेंगे जो बेहद कम पानी और भयंकर सूखे जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी बंपर पैदावार देने में पूरी तरह सक्षम होंगी।

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