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याचिका खारिज कर सुप्रीम कोर्ट ने कहा बदलाव नहीं होगा

एससी एसटी अधिनियम में संशोधनों को दी गयी थी चुनौती

याचिका पर विचार करने से इंकार किया

जो नियम है वही पूरी तरह कायम रहेगा

कमजोर समुदायों के लिए ऐसा नियम है

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में वर्ष 2015 और 2018 में किए गए संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, इन संशोधनों के माध्यम से अत्याचारों की सूची का विस्तार किया गया था, मुक़दमे की सुनवाई की प्रक्रिया को तेज किया गया था तथा पीड़ितों और गवाहों को अधिक सुरक्षा प्रदान की गई थी। इस याचिका के खारिज होने से कानून के मौजूदा सख्त प्रावधान पूरी तरह से बरकरार रहेंगे, जो हाशिए पर मौजूद समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए बेहद अहम माने जाते हैं।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018 में किए गए संशोधनों ने सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में दिए गए उस सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी कर दिया था, जिसमें इस अधिनियम के तहत गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच और पूर्व अनुमति लेने का प्रावधान जोड़ा गया था। 2018 के संशोधन कानून ने इन सभी बाधाओं और आवश्यकताओं को समाप्त कर दिया था और मूल अधिनियम के सख्त तथा कड़े प्रावधानों को पूरी तरह से बहाल कर दिया था, ताकि अपराधियों को आसानी से राहत न मिल सके और कानून की मूल भावना बनी रहे।

अदालत में याचिका दायर करने वाले बृजभूषण सैनी की ओर से यह तर्क दिया गया था कि गैर-एससी/एसटी (सवर्ण या अन्य) व्यक्तियों के खिलाफ यह कोई पूर्वधारणा नहीं बनाई जा सकती कि उन्होंने शिकायत में बताए गए अपराध को किया ही है, क्योंकि ऐसे आरोप व्यक्तिगत रंजिश, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता या पैसे ऐंठने के मकसद से भी लगाए जा सकते हैं।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया था कि ये संशोधन स्पष्ट रूप से मनमाने, कठोर और अनुपातहीन हैं। साथ ही यह दलील दी गई थी कि यह कानून एक ऐसा समानांतर जाति-आधारित आपराधिक न्याय तंत्र तैयार करता है जो केवल आरोपी की गैर-एससी/एसटी स्थिति के आधार पर उसके दोषी होने की पूर्वधारणा बनाता है, जिससे उल्टी या विपरीत भेदभाव, कानून के दुरुपयोग और कानून के शासन का क्षरण होता है। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय ने इन तमाम तर्कों के बावजूद याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।