डॉलर को चुनौती देता ब्रिक्स शिखर सम्मेलन
खुलकर किसी ने चुनौती देने की कोई बात नहीं की। यह सामान्य कूटनीतिक शिष्टाचार भी है फिर भी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने यह संकेत दे दिया कि अब अमेरिकी दादागिरी को चुनौती देने के लिए अनेक देश खड़े हो रहे हैं। हर देश की अपनी अपनी मजबूरियां हैं लिहाजा कोई भी दुनिया के सबसे शक्तिशाली देन से सीधे टकराने से बचता है। फिर भी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के हालिया घटनाक्रम ने वैश्विक राजनीति और अर्थशास्त्र के एक नए दौर की सुगबुगाहट को तेज कर दिया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीतियों, एकपक्षीय फैसलों और कूटनीतिक सीमाओं के उल्लंघन से दुनिया के कई देश भीतर ही भीतर बेहद नाराज हैं। हालांकि, पारंपरिक कूटनीतिक मर्यादा का निर्वाह करते हुए चीन और रूस जैसे प्रमुख देशों ने सार्वजनिक मंचों पर इस नाराजगी को सीधे तौर पर बयान करने से परहेज किया, लेकिन ब्राजील के राष्ट्रप्रमुख ने दो टूक लहजे में यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी संप्रभु राष्ट्र के आंतरिक मामलों में किसी अन्य बाहरी देश का हस्तक्षेप पूरी तरह से अनुचित और अस्वीकार्य है।
उनका यह बयान सीधे तौर पर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी बलों द्वारा जबरन उठाए जाने और गिरफ्तार किए जाने की घटना की ओर एक स्पष्ट संकेत था। दूसरी तरफ ईरान के राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिका ने जिस दलील के आधार पर ईरान पर हमला किया है, वह तथ्य ही गलत है। हम कभी भी परमाणु हथियार बनाने की होड़ में नहीं थे।
इस बात को यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि हमारे सामने इराक का उदाहरण है। सद्दाम हुसैन के बार बार इंकार करने के बाद भी दुनिया यह मान बैठी थी कि वह रासायनिक हथियार बना रहा है। इसी आरोप में अमेरिका ने उस पर हमला कर दिया। अब इतने दिनों बाद यह सच सामने है कि वाकई सद्दाम हुसैन ही सच बोल रहे थे। दूसरी तरफ अमेरिका ने अपनी गलती के लिए माफी भी नहीं मांगी।
वैश्विक प्रभुत्व के दो मुख्य स्तंभ आधुनिक भू-राजनीति में संयुक्त राज्य अमेरिका के वैश्विक वर्चस्व और एकछत्र राज के पीछे मुख्य रूप से दो ही सबसे बड़े और निर्णायक आधार हैं। हथियार उद्योग का निर्यात: अमेरिका का विशालकाय रक्षा और हथियार उद्योग उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। दुनिया भर के संघर्षों को हवा देकर हथियारों का निर्यात करना अमेरिकी विदेश नीति का एक प्रमुख हिस्सा रहा है।
वरना इतने अधिक हथियारों की खपत कैसे होती है और वे हथियार अमेरिका विरोधी आतंकवादी गुटों तक कैसे पहुंचते हैं, इस सवाल का संतोषजनक उत्तर तो खुद अमेरिका के पास भी नहीं हैं। अब भारत भी मिसाइल के मामलों में इस अमेरिकी एकाधिकार को तोड़ता नजर आ रहा है जहां उसके अपने हथियारों की लोकप्रियता तेजी से ऊपर जा रही है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में डॉलर का आधिपत्य: वैश्विक व्यापार, वित्तीय बाजारों, कच्चे तेल के लेन-देन और केंद्रीय बैंकों के मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर का एकछत्र दबदबा है।
यह स्थिति अमेरिका को बिना किसी बड़े आर्थिक प्रयास के वैश्विक अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण रखने की अप्रतिम शक्ति देती है। ब्रिक्स का नया आर्थिक एजेंडा और वैकल्पिक मुद्रा इस सम्मेलन में सामने आए विचार इस बात के अकाट्य प्रमाण हैं कि दुनिया के प्रमुख विकासशील देश अब अमेरिकी आर्थिक और राजनीतिक दबाव को कम करने के लिए एकजुट हो रहे हैं।
सदस्य देशों के बीच इस बात पर गंभीर मंथन चल रहा है कि आपसी व्यापार और लेन-देन के लिए अमेरिकी डॉलर की अनिवार्यता को खत्म कर स्थानीय या किसी नई वैकल्पिक साझा मुद्रा को अपनाया जाए। यदि ब्रिक्स के ये देश डॉलर को छोड़कर आपसी मुद्राओं में व्यापार करने के अपने इस लक्ष्य में कामयाब हो जाते हैं, तो वैश्विक वित्तीय बाजार में अमेरिकी डॉलर का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाएगा।
व्यापारिक राष्ट्र की अंतर्विरोध भरी चालें अमेरिका मूल रूप से एक शुद्ध व्यापारी राष्ट्र रहा है, जिसकी पूरी जीवनशैली और आर्थिक सेहत वैश्वीकरण और मुनाफे के इर्द-गिर्द घूमती है। जब अमेरिकी नीतियों और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अदूरदर्शी फैसलों के कारण वैश्विक स्तर पर डॉलर का दबदबा घटने लगेगा और व्यापारिक साझेदार उससे छिटकने लगेंगे, तो इसका सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
घाटे के इस दौर में अमेरिकी उद्योगपति और वहां की जनता अपने राष्ट्रपति के आक्रामक और अस्थिर नेतृत्व को और कितनी लंबी अवधि तक बर्दाश्त करेगी, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। दुनिया अब एकध्रुवीय व्यवस्था से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही है, जहां किसी एक देश की दादागिरी लंबे समय तक नहीं टिक सकती। यह भी सच है कि राष्ट्रपति की कुर्सी पर चाहे कोई हो, अमेरिकी राजनीति दरअसल वहां के कॉरपोरेट घराने की चलाते हैं।