जिसे कभी लोकतंत्र का ‘लौह पुरुष’ समझा जाता था, आज उसकी हालत उस मौसम विज्ञानी जैसी हो गई है, जो अपनी ही खिड़की से देखकर बता रहा हो कि बाहर भारी बारिश है या पत्थर बरस रहे हैं। कल तक जिनका हर एक फरमान इस तरह सिर आँखों पर रखा जाता था, जैसे वह सीधे आसमान से उतरी कोई आसमानी किताब हो, आज वे साहब गली के नुक्कड़ पर खड़े होकर यह सोच रहे हैं कि कौन सा रास्ता ऐसा है जहाँ कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं लगा है।
अरे, हुकूमत का जलवा भी क्या अजीब चीज़ है! जब तक चलती है, ऐसा लगता है कि सूरज भी इसी विभाग की अनुमति से उगता और छिपता है। लेकिन असली ड्रामा तब शुरू हुआ जब मुल्क के चंचल और नासमझ समझे जाने वाले बच्चों ने मैदान संभाल लिया। वे बच्चे, जिन्हें बड़ों की दुनिया में सिर्फ होमवर्क करने और समय पर सोने के लिए उपयुक्त माना जाता था, अचानक राजनीति के मैदान में ऐसे उतरे कि ‘लौह किला’ बनी हुई सरकार ताश के पत्तों के महल की तरह भरभराकर बैठ गई।
सबसे मजेदार नजारा तो सरकारी दफ्तरों के भीतर का है। जिन अफसरों की रीढ़ की हड्डी को देखकर ऐसा लगता था कि वह कभी लोहे से बनी थी, अब वह अचानक रबड़ जैसी लचीली हो गई है। दफ्तरों में अब मौखिक आदेशों का जमाना लद चुका है। फाइल लेकर पहुँचने वाले मातहतों से जब मंत्री जी कहते हैं कि चुपचाप यह काम कर दो, तो अफसर साहब अपनी ऐनक को नाक पर खिसकाते हुए पूरी मासूमियत से पूछते हैं, साहब, थोड़ा लिखित में दे देते तो बड़ी कृपा होती, कल को बच्चे सड़क पर आ गए तो कम से कम हमारे पास फाइल पर आपके हस्ताक्षर का रक्षा कवच तो रहेगा! जिस प्रशासन के इशारे पर परिंदा भी पर नहीं मारता था, वह आज एक अदद रसीद या लिखित आदेश के लिए तरस रहा है।
इसी बात पर एक काफी पुरानी फिल्म का गीत याद आ रहाहै। फिल्म बूट पालिश वर्ष 1954 में बनी थी। इस गीत को लिखा था शैलेंद्र ने और संगीत में ढाला था शंकर जयकिशन ने। इसे आशा भोंसले और मोहम्मद रफी ने दल के साथ गाया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।
नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है
नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है
मुट्ठी में है तक़दीर हमारी, मुट्ठी में है तक़दीर हमारी
हम ने क़िस्मत को बस में किया है
हम ने क़िस्मत को बस में किया है
भोली भली मतवाली आँखों में क्या है
भोली भली मतवाली आँखों में क्या है
आँखों में झूमे उम्मीदों की दिवाली
आँखों में झूमें उम्मीदों की दिवाली
आनेवाली दुनिया का सपना सजा है
आनेवाली दुनिया का सपना सजा है …
भीख में जो मोती मिले लोगे या न लोगे
ज़िंदगी के आँसूओं का बोलो क्या करोगे
ज़िंदगी के आँसूओं का बोलो क्या करोगे
भीख में जो मोती मिले तो भी हम ना लेंगे
भीख में जो मोती मिले तो भी हम ना लेंगे
ज़िंदगी के आँसूओं की माला पहनेंगे
ज़िंदगी के आँसूओं की माला पहनेंगे
मुश्किलों से लड़ते भिड़ते जीने में मज़ा है
मुश्किलों से लड़ते भिड़ते जीने में मज़ा है
हम से न छुपाओ बच्चो हमें भी बताओ
आनेवाले दुनिया कैसी होगी समझाओ
आनेवाले दुनिया कैसी होगी समझाओ
आनेवाले दुनिया में सब के सर पे ताज होगा
आनेवाले दुनिया में सब के सर पे ताज होगा
न भूखों की भीड़ होगी न दुखों का राज होगा
न भूखों की भीड़ होगी न दुक्कों का राज होगा
बदलेगा ज़मना ये सितारों पे लिखा है
बदलेगा ज़मना ये सितारों पे लिखा है …
और न्यायपालिका का हाल तो पूछिए ही मत! जिन अदालतों के दरवाजे सरकार विरोधी मामलों में इस तरह बंद हो जाते थे जैसे किसी फाइव-स्टार होटल में बिना रिजर्वेशन के एंट्री नहीं मिलती, वहीं की फिज़ा बदल चुकी है। अब हालात यह हैं कि उन्हीं अदालतों के गलियारों से मुख्य चुनाव आयुक्त की सुपुत्री और नोएडा के जिलाधिकारी महोदय के खिलाफ भी ऐसे-ऐसे आदेश पारित हो रहे हैं, जिन्हें सुनकर लगता है कि कानून की देवी ने अपनी आँखों से पट्टी हटाकर सीधे चश्मा पहन लिया है। ऐसा लगता है कि अदालतों के तख्ते पर अब न्याय की देवी ने भी बच्चों के साथ मिलकर कोई गुप्त समझौता कर लिया है।
कुल मिलाकर, इस नन्हें तूफ़ान ने सत्ता के गलियारों में ऐसा भूचाल ला दिया है कि बड़े-बड़े सूरमाओं के पसीने छूट रहे हैं। यह इस बात का सबसे बेहतरीन सबूत है कि जब हौसले बुलंद हों, तो लोहे के किले भी रेत के घरौंदे साबित होते हैं। अब देखना यह है कि यह नया दौर राजनेताओं को कौन सा नया सबक सिखाता है।