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अत्यंत सुक्ष्म नौनोलेजर विकसित कर लिया है

डीटीयू के शोधकर्ताओँ ने अब कंप्यूटर तकनीक में बदलाव किया

कंप्यूटर का ऊर्जा खर्च कम करेगा

अंदर की गर्मी इसकी वजह से है

भविष्य का डेटा संचार भी बदलेगा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः  डेनमार्क की टेक्निकल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक अत्यंत सूक्ष्म नैनोलेजर विकसित किया है, जो भविष्य के कंप्यूटरों, स्मार्टफोन और डेटा सेंटर्स की ऊर्जा खपत को आधा कर सकता है। इस महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सफलता को प्रतिष्ठित पत्रिका ‘साइंस एडवांसेज’ में प्रकाशित किया गया है। यह तकनीक भविष्य के माइक्रोचिप्स में डेटा संचार के तरीके को पूरी तरह से बदल सकती है।

वर्तमान में इंटरनेट का अधिकांश डेटा फाइबर ऑप्टिक केबल्स के माध्यम से प्रकाश की गति से यात्रा करता है, लेकिन कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के भीतर आज भी डेटा इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स यानी बिजली के जरिए ही भेजा जाता है। बिजली के प्रवाह से भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है, जो डेटा ट्रांसफर की गति को सीमित करती है और अत्यधिक ऊर्जा की खपत का कारण बनती है। इसके विपरीत, इस नए नैनोलेजर के जरिए भविष्य के माइक्रोचिप्स में सूचनाओं को बिजली के बजाय फोटॉन्स यानी प्रकाश के कणों के माध्यम से प्रसारित किया जा सकेगा।

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डीटीयू के प्रोफेसर जेस्पर मोर्क के अनुसार, यह नैनोलेजर उच्च प्रदर्शन और अत्यंत सूक्ष्म आकार का एक अनूठा संयोजन प्रस्तुत करता है। इस तकनीक के उपयोग से कंप्यूटर चिप्स के भीतर सूचनाओं का आदान-प्रदान बेहद कम ऊर्जा हानि के साथ संभव हो सकेगा। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि कंप्यूटरों में इन नैनोलेजर का व्यापक उपयोग होने से कुल ऊर्जा खपत में लगभग पचास प्रतिशत तक की भारी कमी आ सकती है। भविष्य के माइक्रोचिप्स पर ऐसे हजारों छोटे लेजर एक साथ काम करके डेटा संचार को सुगम बनाएंगे।

इस अभूतपूर्व नैनोलेजर को डीटीयू नैनोलैब की क्लीन रूम सुविधा में तैयार किया गया है। इस डिवाइस की मूल संरचना एक नैनोकेविटी पर आधारित है, जो प्रकाश को एक असाधारण रूप से छोटे क्षेत्र में फंसाकर अत्यधिक केंद्रित करती है। इस स्तर पर प्रकाश को सीमित करना अब तक बेहद कठिन माना जाता था। जब शोधकर्ता इस उपकरण पर प्रकाश पुंज डालते हैं, तो फोटॉन्स और इलेक्ट्रॉन्स एक ही सूक्ष्म क्षेत्र में सघन हो जाते हैं, जिससे यह लेजर कमरे के सामान्य तापमान पर भी बहुत कम ऊर्जा की आवश्यकता के साथ प्रभावी ढंग से कार्य करता है।

इस तकनीक के सामने अगली सबसे बड़ी चुनौती इस नैनोलेजर को पूरी तरह से बिजली से संचालित करना है। यदि शोधकर्ता इस बाधा को पार कर लेते हैं, तो कंप्यूटिंग, संचार और स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आ सकते हैं। विशाल ऊर्जा की खपत करने वाले डेटा सेंटर्स को इससे बड़ी राहत मिलेगी और कार्बन उत्सर्जन घटने से पर्यावरण को भी भारी लाभ होगा। इसके अलावा, स्वास्थ्य क्षेत्र में यह नैनोलेजर अत्यंत संवेदनशील बायोसेन्सर और हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग प्रणालियों के विकास में मददगार साबित होगा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इन शेष तकनीकी चुनौतियों को अगले पांच से दस वर्षों के भीतर सफलता पूर्वक हल कर लिया जाएगा।

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