छात्र आंदोलन और एमएमडीआर बिल पर गर्माई झारखंड की राजनीति
छात्रों का मुद्दा सरकार सुलझा चुकी है
भाजपा ने फिर से आंदोलन की बात कही
बाकी दल मिलकर भाजपा के ही खिलाफ
राष्ट्रीय खबर
रांचीः झारखंड का राजनीतिक माहौल इन दिनों विभिन्न जनमुद्दों, छात्र आंदोलनों और केंद्रीय नीतियों को लेकर पूरी तरह गर्मा गया है। राज्य के प्रमुख राजनीतिक दल आगामी रणनीतियों को धार देने और जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। एक ओर जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) छात्र आंदोलनों के सहारे राज्य सरकार की घेराबंदी करने में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और वामपंथी दल अपने-अपने स्तर पर राजनीतिक जमीन मजबूत करने में लगे हैं।
भाजपा राज्य में युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर सड़क से लेकर प्रशासनिक स्तर तक अपनी सक्रियता लगातार बनाए हुए है। पार्टी छात्र संगठनों के माध्यम से स्थानीय नियोजन, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और युवाओं के अधिकारों को लेकर हेमंत सोरेन सरकार पर हमलावर है। भाजपा का प्रयास है कि युवाओं के असंतोष को एक बड़े जनांदोलन में तब्दील कर राज्य सरकार को बैकफुट पर धकेला जाए।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल कांग्रेस पार्टी ने भी इस मुद्दे पर अपनी किलेबंदी मजबूत कर ली है। पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी के निर्देशों और उनकी नीतियों के अनुरूप कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने छात्र आंदोलनों को सही दिशा देने और युवाओं के हितों की रक्षा के लिए अपनी रणनीति तैयार की है। कांग्रेस का मुख्य ध्यान इस बात पर है कि युवाओं के मुद्दों पर विपक्षी दल भाजपा किसी प्रकार का राजनीतिक लाभ न उठा सके। इसके लिए पार्टी अपने युवा और छात्र संगठनों को जमीन पर उतारकर संवाद स्थापित कर रही है।
तीसरे मोर्चे पर, राज्य की मुख्य सत्तारूढ़ पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने केंद्रीय नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। झामुमो खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक यानी एमएमडीआर बिल को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार तीखे हमले कर रहा है। पार्टी का आरोप है कि केंद्र सरकार इस विधेयक के जरिए राज्यों के खनन अधिकारों और संसाधनों पर अतिक्रमण करने का प्रयास कर रही है, जिससे झारखंड जैसे खनिज समृद्ध राज्य के राजस्व और स्थानीय हितों को भारी नुकसान पहुंचेगा।
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच वाम मोर्चे में शामिल विभिन्न दल भी केंद्र की भाजपा सरकार की नीतियों का कड़ा विरोध कर रहे हैं। हालांकि, वामपंथी दलों का विरोध अब तक मुख्य रूप से बयानों और बैठकों तक ही सीमित नजर आ रहा है और वे अब तक जमीनी स्तर पर बड़े आंदोलनों के साथ नहीं उतरे हैं। बहरहाल, छात्र हित और संसाधनों के अधिकार को लेकर छिड़ा यह राजनीतिक संग्राम आने वाले दिनों में और तेज होने के आसार हैं।