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डूम्सडे ग्लेशियर पर छिपे हुए भूकंपों की खोज

जलवायु परिवर्तन के तेजी से बढ़ते खतरों का संकेत

ऐसे सैकड़ों रिकार्ड वहां दर्ज हुए हैं

आपस में टकराकर भूकंप बनाते हैं

पूरा ढह गया तो दुनिया में तबाही

राष्ट्रीय खबर

रांचीः ग्लेशियल भूकंप एक विशेष प्रकार के भूकंप होते हैं जो ठंडे और बर्फ से ढके क्षेत्रों में उत्पन्न होते हैं। लगभग 20 वर्ष से अधिक समय पहले उत्तरी गोलार्ध में पहली बार खोजे गए ये भूकंप तब आते हैं, जब ग्लेशियरों से बर्फ के विशाल टुकड़े टूटकर समुद्र में गिरते हैं। अब तक अंटार्कटिका में ऐसे बहुत कम भूकंप दर्ज किए गए थे। लेकिन जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित एक अध्ययन में, 2010 से 2023 के बीच अंटार्कटिका में ऐसे सैकड़ों भूकंपों के साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हैं। इनमें से अधिकांश भूकंप थ्वेट्स ग्लेशियर के समुद्री छोर पर दर्ज किए गए। इसे डूम्सडे ग्लेशियर भी कहा जाता है, क्योंकि यदि यह पूरी तरह ढह जाता है, तो वैश्विक समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है।

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जब ऊंचे और पतले हिमखंड ग्लेशियर के किनारे से टूटकर समुद्र में गिरते और पलटते हैं, तो वे मुख्य ग्लेशियर से भीषण रूप से टकराते हैं। इस टक्कर से तीव्र कंपन यानी सिस्मिक तरंगेंत्पन्न होती हैं, जो उद्गम स्थल से हजारों किलोमीटर दूर तक फैलती हैं। आम भूकंपों या परमाणु परीक्षणों के विपरीत, हिमनदीय भूकंप उच्च-आवृत्ति वाली तरंगें पैदा नहीं करते, इसलिए इन्हें पहचानना बेहद कठिन होता है।

ग्रीनलैंड में आने वाले हिमनदीय भूकंप आकार में बड़े होते हैं और मौसम के अनुसार उत्तर ग्रीष्मकाल में अधिक आते हैं। लेकिन अंटार्कटिका में ये भूकंप कम तीव्रता के होने के कारण वैश्विक नेटवर्क की पकड़ में नहीं आ पाते थे। अंटार्कटिका में स्थापित स्थानीय सिस्मिक स्टेशनों के डेटा का विश्लेषण करने पर 360 से अधिक हिमनदीय भूकंपीय घटनाओं का पता चला, जिनमें से 245 थ्वेट्स ग्लेशियर के पास केंद्रित थीं।

थ्वेट्स ग्लेशियर पर 2018 से 2020 के बीच भूकंपों की संख्या सबसे अधिक रही। यह वही समय था जब उपग्रह डेटा के अनुसार ग्लेशियर की आइस टंग’ (बर्फ की जीभ) का समुद्र की ओर प्रवाह तेज हो गया था। यह बदलाव तापमान के बजाय समुद्री स्थितियों से प्रेरित प्रतीत होता है। वहीं, पाइन आइलैंड ग्लेशियर के पास दर्ज हुई घटनाएं ग्लेशियर के किनारे से दूर थीं, जो शोधकर्ताओं के लिए अब भी एक पहेली बनी हुई हैं। थ्वेट्स ग्लेशियर पर हिमखंडों के टूटने और इन भूकंपों के अध्ययन से भविष्य में समुद्र के जलस्तर में होने वाली वृद्धि का अधिक सटीक अनुमान लगाने में मदद मिलेगी।

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