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बिना आंदोलन के भी यह काम हो सकता था

भारत की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था दशकों से उपेक्षा, नीतिगत कमियों और प्रशासनिक उदासीनता का शिकार रही है। जर्जर भवन, टूटी दीवारें, पीने के पानी और शौचालयों का अभाव तथा शिक्षकों की भारी कमी — यह देश के हजारों सरकारी स्कूलों की कड़वी सच्चाई है। हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा भारत के जर्जर स्कूलों की स्थिति में सुधार लाने और जमीनी हकीकत को सामने लाने के उद्देश्य से चलाए गए अभियान ने बेहद उजागर करने वाले और चिंताजनक परिणाम प्रस्तुत किए हैं।

जब भी कोई नागरिक या राजनीतिक समूह प्रशासनिक कमियों को उजागर करने का प्रयास करता है, तो राज्य की त्वरित प्रतिक्रिया अक्सर सुधार की बजाय दमनकारी होती है। सीजेपी के इस अभियान के दौरान भी यही देखने को मिला। महाराष्ट्र के लातूर में सीजेपी नेता अभिजीत दीपके के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। उन पर सरकारी स्कूल में अनधिकृत रूप से प्रवेश करने और सरकारी कामकाज में बाधा डालने का आरोप लगाया गया।

राजस्थान में स्थिति और भी चिंताजनक रही, जहां स्कूल बुनियादी ढांचे की कमियों को उजागर करने पहुंचे सीजेपी के एक अन्य दल के साथ मारपीट की गई। भारत के स्कूल बुनियादी ढांचे की पोल खोलने के इस प्रयास के खिलाफ राज्य की दंडात्मक कार्रवाई जल्द समाप्त होती नहीं दिखती। जिस देश में मंत्रियों के बंगलों के रखरखाव, नवीनीकरण और सुख-सुविधाओं पर 92 करोड़ रुपये जैसी भारी-भरकम राशि पानी की तरह बहाई जा सकती है, वहां बच्चों के भविष्य का निर्माण करने वाले स्कूलों की दशा सुधारने के लिए धन और इच्छाशक्ति की इतनी कमी क्यों है?

दिल्ली की पूर्व आम आदमी पार्टी सरकार का उदाहरण हमारे सामने है, जिसने अपने कार्यकाल के दौरान यह साबित कर दिया था कि सही दिशा में काम किया जा सकता है। राज्यों द्वारा सीजेपी के अभियान को दबाने के चाहे जितने भी प्रशासनिक प्रयास किए जा रहे हों, इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण और सकारात्मक पहलू उभरकर सामने आया है। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर में लगभग 300 स्कूली बच्चों ने कलेक्टर कार्यालय तक पैदल मार्च किया।

लखनऊ में छात्राओं ने बुनियादी नागरिक सुविधाओं के पूर्ण अभाव पर अपनी गहरी नाराजगी और विरोध जाहिर किया। जयपुर में विशेष आवश्यकताओं (विकलांगता) वाले छात्रों ने जर्जर कक्षाओं की ओर प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराया। जब हम इन स्थानीय विरोध प्रदर्शनों की कड़ियों को आपस में जोड़कर देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल कुछ स्कूलों की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की दयनीय स्थिति को उजागर करता है। आंकड़े भी भारत की स्कूली शिक्षा में जारी असफलताओं की इस लंबी सूची की पुष्टि करते हैं।

देश के अलग-अलग राज्यों में शिक्षा व्यवस्था विभिन्न प्रकार के संकटों से जूझ रही है। झारखंड में स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात बेहद खराब है, जिसके कारण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण ध्यान नहीं मिल पाता। पश्चिम बंगाल में डिजिटल युग के बावजूद बंगाल के सरकारी स्कूलों में इंटरनेट पहुंच और तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी सुधार की आवश्यकता है। मेघालय में विशेष जरूरतों (दिव्यांग) वाले छात्रों के लिए अनुकूल शौचालयों की भारी कमी है। कर्नाटक में बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल संचालित हो रहे हैं जहां पूरी संस्था का दारोमदार केवल एक शिक्षक के कंधों पर है।

तमिलनाडु में आधुनिक शिक्षा के इस दौर में तमिलनाडु के कई क्षेत्रों में पर्याप्त डिजिटल पुस्तकालयों का अभाव बना हुआ है। केरल में शैक्षणिक सूचकांकों में शीर्ष पर रहने वाले केरल जैसे राज्य में भी ऐसी विरोधाभासी स्थितियां हैं जहां कई शैक्षणिक संस्थानों में नामांकित छात्रों की संख्या न के बराबर या शून्य है। वर्तमान में स्कूली शिक्षा पर भारत का कुल जीडीपी खर्च केवल 4.1फीसद है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा अनुशंसित 6 प्रतिशत के लक्ष्य से काफी नीचे है।

लेकिन इस अंधेरे के बीच जो बात सबसे अधिक उम्मीद जगाती है, वह है स्कूलों के मुख्य हितधारकों — यानी स्वयं छात्रों और उनके परिवारों — द्वारा उठाई जा रही जवाबदेही की यह नई आवाज। अब भारत के बच्चे और युवा अपनी सक्रियता से उस ऐतिहासिक जड़ता को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों द्वारा — चाहे वे किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा के क्यों न हों — इस जन-आंदोलन का जवाब पहले उपेक्षा, दमन और उदासीनता से ही दिया जाएगा। हालांकि, यदि युवाओं के अंदर उठ रही यह भावना और चेतना कायम रहती है, तो यह भारतीय लोकतंत्र को एक नया जीवन प्रदान कर सकती है। इस नवजात सामूहिक कार्रवाई का लाभ केवल शिक्षा क्षेत्र के सुधारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि युवाओं के इस साहसी असंतोष और लोकतांत्रिक अभिव्यक्तियों से पूरे देश के लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी।