बारिश के गांव और खेत पानी में डूबे हैं
बैंकॉकः म्यांमार के मध्य क्षेत्र में भारी मानसूनी बाढ़ ने कई गांवों और धान के खेतों को जलमग्न कर दिया है, जिससे युद्ध के कारण पहले से ही विस्थापित हुए लोगों सहित कई परिवारों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र ने यह जानकारी दी। मध्य सगाई क्षेत्र के वेटलेट टाउनशिप की 53 वर्षीय ग्रामीण चो म्यिंट ने कहा, हम जिस पीड़ा का सामना कर रहे हैं, उसे मैं शब्दों में बयां भी नहीं कर सकती कि यह कितना दर्दनाक है। एक पलटी हुई नाव के पास खड़े होकर उन्होंने शुक्रवार को बताया कि उनके परिवार को बढ़ते बाढ़ के पानी से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा और वे पूरी तरह बेसहारा हो गए हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने शुक्रवार को कहा कि जुलाई से लेकर अब तक सगाई, रखाइन, इरावदी और कचिन राज्यों में भीषण मानसूनी बाढ़ के कारण अनुमानित 3,90,000 लोग प्रभावित हुए हैं, जिनमें अकेले सगाई क्षेत्र के 2,30,000 लोग शामिल हैं।
मानवीय मामलों के समन्वय के लिए संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (ओसीएचए) ने कहा कि इन आंकड़ों में वे लोग भी शामिल हैं जो म्यांमार में 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद शुरू हुए गृहयुद्ध से प्रभावित हुए थे।
वेटलेट टाउनशिप के एक अन्य ग्रामीण यू सिंट ने कहा कि इस क्षेत्र में कुछ युद्ध शरणार्थी छोटे, अस्थायी आश्रयों में रह रहे थे जो पूरी तरह से पानी में डूब चुके हैं। उन्होंने कहा, वे कुछ भी नहीं बचा सके। यह वास्तव में भयानक है। उन्होंने आगे कहा कि बाढ़ ने कई लोगों की आजीविका को भी बरबाद कर दिया है। उन्होंने बताया, धान के पौधे पहले ही बह चुके हैं… इस क्षेत्र में अब धान की रोपाई करना बिल्कुल असंभव है। भले ही हम दोबारा बीज बोएं, लेकिन अभी तक जमीन पानी से बाहर नहीं आई है।
म्यांमार के समाज कल्याण, राहत और पुनर्वास मंत्रालय ने कहा कि 11 अगस्त तक, सगाई में भारी बारिश और नदी के उफान के कारण 3,220 परिवारों के 11,400 से अधिक लोगों को बाढ़ राहत केंद्रों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। वेटलेट में, आंग को अपनी गाय की देखभाल करने के लिए अपने साले के साथ वहीं रुक गए और बताया कि वहां केवल 10 या 14 लोग ही बचे हैं।
वे नाव से आने वाले स्थानीय राहत कर्मियों द्वारा दिए गए तिरपाल के नीचे अपने घर की ऊपरी मंजिल पर रह रहे हैं और इंस्टेंट नूडल्स तथा बोतलबंद पानी के सहारे जी रहे हैं। घुटनों तक गंदे पानी में खड़े होकर उन्होंने कहा, दानदाताओं के आने से पहले, हमारे पास बाढ़ का पानी उबालकर पीने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।