Breaking News in Hindi

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई में नागरिकों को भरोसा दिलाया

मतदाता सूची से नाम हटने से नागरिकता खत्म नहीं

  • तीन जजों की पाठ में मामला है

  • राज्य सरकार सभी लाभ खत्म कर ही

  • प्राधिकरण में लाखों मामले लंबित

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सु्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक बार फिर साफ किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का स्वतः यह अर्थ नहीं है कि किसी व्यक्ति की नागरिकता छिन गई है। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से हटाए गए लोगों को बड़े पैमाने पर कल्याणकारी योजनाओं के लाभों से वंचित किए जाने पर चिंता जताते हुए की।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ प्रसेनजीत बोस द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में उन लाखों मतदाताओं के लिए अपीलीय प्रक्रिया को अधिक सुलभ और सुव्यवस्थित बनाने के निर्देश देने की मांग की गई है, जिनके नाम एसआईआर के दौरान हटा दिए गए थे।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बिहार एसआईआर पर दिए अपने पुराने फैसले को याद दिलाते हुए रेखांकित किया कि चुनाव आयोग नागरिकता तय करने वाला संवैधानिक प्राधिकरण नहीं है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को संदिग्ध नागरिकता के आधार पर मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो चुनाव आयोग का यह कर्तव्य है कि वह नागरिकता अधिनियम के तहत निर्णय के लिए मामला केंद्र सरकार को भेजे। जब तक ऐसा कोई निर्णय नहीं हो जाता, तब तक उस व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने जमीनी हकीकत पर चिंता जताई। उन्होंने कोर्ट को बताया कि 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष लगभग 34 लाख अपीलें अभी भी लंबित हैं। इनमें से दो न्यायाधीश इस्तीफा दे चुके हैं और अब तक केवल 38,000 अपीलों का ही निपटारा हो सका है। राहत की बात यह है कि जिन अपीलों पर फैसला आया है, उनमें से करीब 70 प्रतिशत मामलों में लोगों के नाम वापस सूची में जोड़े गए हैं।

शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि इतनी बड़ी संख्या में अपीलें लंबित होने के बावजूद, पश्चिम बंगाल सरकार ने ऐसे लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली, अन्नपूर्णा योजना और यहां तक कि जाति प्रमाण पत्र के लाभों से वंचित करने की अधिसूचनाएं जारी कर दी हैं। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि वह यह स्पष्ट करे कि अपील लंबित रहने के दौरान किसी को भी इन कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित न किया जाए।

अधिवक्ता नेहा राठी के माध्यम से दायर इस याचिका में अपीलीय तंत्र को बेहतर बनाने के लिए कई व्यावहारिक निर्देश देने की मांग की गई है। पीठ ने अपने बिहार फैसले के रुख को दोहराते हुए कहा कि चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने का फैसला तो कर सकता है, लेकिन यह अपने आप में नागरिकता की स्थिति को खत्म नहीं करता।