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कैसे साबित करें कि वाकई हम भारतीय है

आधार कार्ड नहीं,पैन कार्ड नहीं, राशन कार्ड नहीं और अब पासपोर्ट भी नहीं। आजादी के आठ दशक बाद यह पूछना एक अजीब सवाल है कि वास्तव में भारतीय कौन है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि नीले भारतीय पासपोर्ट का कद—जिसकी संख्या लगभग 9 करोड़ है—जोखिम में पड़ गया है। और यह काम किसी और ने नहीं, बल्कि खुद भारत सरकार ने किया है।

हम इस स्थिति तक कैसे पहुंचे, जबकि 90 करोड़ से अधिक भारतीय ऑनलाइन हैं, ढाई अरब लोगों के पास खुदरा बैंक खाते हैं और 1.4 अरब लोगों के पास कार्ड हैं? इनमें से भारतीय कौन है, इसका कोई वैज्ञानिक और स्थापित पैमाना नहीं है। जो दस्तावेज थे, उन्हें चुनाव आयोग ने अमान्य कर दिया है। अब चुनाव आयोग मतदाता जांच रहा है या नागरिकता, यह केंद्र सरकार बता सकती है।

वैसे  इसकी शुरुआत 1955 में हुई थी, जब नागरिकता अधिनियम ने उन उदार और समावेशी संवैधानिक सिद्धांतों को प्रतिध्वनित किया था, जिसके अनुसार 15 जुलाई 1947 तक अविभाजित भारत में रहने वाला कोई भी व्यक्ति नागरिकता के लिए पात्र था। नागरिकता का दावा करने के तीन विकल्प मौजूद हैं। सभी मामलों में, यदि आवेदक किसी अन्य देश का नागरिक था, तो भारतीय नागरिकता का लाभ उठाने के लिए उस संबद्धता को त्यागना अनिवार्य है।

2023 से, भारतीय मूल के व्यक्तियों (जिन्हें भारत में जन्मे व्यक्तियों की संतान के रूप में परिभाषित किया गया है) और उनके बच्चों के लिए ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया (ओसीआई) कार्ड के माध्यम से दोहरी नागरिकता का एक हल्का संस्करण उपलब्ध है। ओसीआई के पास भारतीयों के समान राजनीतिक अधिकार नहीं हैं, लेकिन उन्हें नागरिकता के लिए गैर-भारतीय मूल के आवेदकों की तुलना में त्वरित अधिकार मिलते हैं।

उन्हें अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) के समान यात्रा, आर्थिक और वित्तीय लाभ मिलते हैं लेकिन वे कृषि संपत्ति या बागान नहीं खरीद सकते। दुनिया भर में लगभग 40 लाख ओसीआई धारक हैं, जो विदेशों में रहने वाले 1.8 करोड़ भारतीय मूल के लोगों का 25 प्रतिशत से भी कम है। विदेश में रहने वाले एनआरआई (भारतीय पासपोर्ट धारक) लगभग 1.8 करोड़ हैं, जबकि अन्य 7 करोड़ भारतीय पासपोर्ट धारक भारत में ही रहते हैं। यह संकेत कि यह बेफिक्र दौर खत्म हो गया है, दो दशक पहले 2004 में मिला था।

सरकार ने नागरिकता अधिनियम में संशोधन करके धारा 14ए जोड़ी, जिसमें केंद्र सरकार को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करने का अधिकार दिया गया। अधिनियम के 2023 के संशोधन के अनुसार, एक राष्ट्रीय डिजिटल नागरिक पंजीकरण प्रणाली बनाई जा रही है, जो पूरे देश में जन्म और मृत्यु को निर्बाध रूप से जोड़ेगी। लेकिन हम अभी वहां तक नहीं पहुंचे हैं। ये प्रमाण पत्र उस श्रेणी को परिभाषित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं जिसके तहत नागरिकता का दावा किया जाता है।

व्यवहार में, नागरिक रिकॉर्ड—जन्म, मृत्यु और मतदाता सूची—उदार और समावेशी रहे हैं, जो जन्म या वंश के डेटा को फोरेंसिक रूप से निर्धारित करने के बजाय जमीनी स्तर पर मौजूद आबादी को दर्ज करने की कोशिश करते हैं। जन्म और मृत्यु के महापंजीयक के पास दशकीय जनगणना कार्यों के प्रबंधन सहित कई कार्य हैं। भारतीय परिवार कागजी रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने में आत्मनिर्भर रहे हैं—उम्मीद है कि अब इसे डिजीलॉकर ऐप में सुरक्षित रखा जा रहा है।

अब तक आम धारणा यही थी कि पासपोर्ट नागरिकता का एक उच्च-स्तरीय, प्रथम दृष्टया प्रमाण है। तो, भारतीय पासपोर्ट होने के बावजूद कोई भारतीय नागरिकता कैसे खो सकता है?  बॉम्बे हाईकोर्ट के 2013 के बाद के फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पासपोर्ट अपने आप में नागरिकता का प्रमाण नहीं है। किसी ने यह दावा नहीं किया कि सरकार ने संबंधित पासपोर्ट रद्द कर दिए थे। विदेश मंत्रालय ने तर्क दिया कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है जो उन लोगों को भी जारी किया जा सकता है जो भारत के नागरिक नहीं हैं।

विदेश मंत्रालय तथ्यात्मक रूप से सही था। पासपोर्ट का उद्देश्य भारतीय नागरिक की विदेशी यात्रा की जरूरतों को पूरा करना है। जब तक नागरिक पंजीकरण कार्ड उपलब्ध नहीं हो जाता, तब तक दस्तावेजों का एक पुलिंदा आवश्यक रहेगा—वंश साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र, अस्तित्व को मान्य करने के लिए कार्ड, संपत्ति के कागजात, बिजली और पानी के बिल ताकि भारत में निवास की अवधि स्थापित हो सके, और चुनाव आयोग का मतदाता पहचान पत्र। एक निर्दोष नागरिक के दृष्टिकोण से, विशेष रूप से कम साक्षरता वाले समाज में, न्यायपालिका और सरकार का यह कर्तव्य है कि वे राजनीतिक रूप से सुविधाजनक कार्रवाई के उत्साह को संयमित रखें और व्यक्ति की पीड़ा के प्रति संवेदनशील रहें।