व्यवस्था की विफलता बनाम राजनीतिक उपहास
भारतीय शिक्षा प्रणाली की रीढ़ माने जाने वाली नीट-यूजी परीक्षा, जो लाखों मेधावी छात्रों के सपनों का मार्ग प्रशस्त करती है, हाल के दिनों में अभूतपूर्व विवादों के भंवर में फंसी हुई है। पेपर लीक के आरोपों ने न केवल परीक्षा की शुचिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की कार्यप्रणाली को भी कठघरे में ला खड़ा किया है।
यह संकट केवल एक प्रश्नपत्र के लीक होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस गहरे प्रशासनिक क्षरण का प्रतीक है जिसे सुधारने के दावे बार-बार खोखले साबित हो रहे हैं। जब नीट परीक्षा के दौरान अनियमितताओं की खबरें सामने आईं, तो पूरे देश में आक्रोश की लहर दौड़ गई। स्थानीय स्तर पर छात्र सड़कों पर उतर आए और एनटीए की जवाबदेही तय करने की मांग करने लगे।
छात्रों का सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि एक स्वायत्त संस्था होने के बावजूद एनटीए बार-बार ऐसी गलतियों को कैसे दोहरा सकती है? क्या यह तकनीकी चूक है या एक सुनियोजित मिलीभगत? सरकार ने अपनी साख बचाने के लिए तुरंत बचाव की मुद्रा अपनाई और सीबीआई जांच के आदेश देकर इस आग को ठंडा करने का प्रयास किया।
जांच के दौरान कई कोचिंग माफियाओं और बिचौलियों की संलिप्तता सामने आई, जिन्होंने आर्थिक लाभ के लिए लाखों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ किया था। हालांकि, इस जांच के दौरान सबसे चिंताजनक पहलू वह खामोशी है, जो एनटीए के भीतरी गलियारों में व्याप्त है। हालांकि बाहरी स्तर पर गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन एनटीए के भीतर मौजूद उन रसूखदार तत्वों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिनकी मिलीभगत के बिना इतनी बड़ी सेंधमारी संभव नहीं थी।
यह सिस्टम का वह हिस्सा है जो हमेशा की तरह पर्दे के पीछे सुरक्षित है और जिसकी कोई विस्तृत सूचना सार्वजनिक नहीं की गई है। इस मौन ने व्यवस्था पर अविश्वास को और गहरा कर दिया है। राजनीतिक परिदृश्य की बात करें, तो इस अराजकता के बीच एक अप्रत्याशित मोड़ तब आया, जब अमेरिका में बैठे एक भारतवंशी युवक ने कॉक्रोच जनता पार्टी के गठन की घोषणा कर दी। सोशल मीडिया के दौर में यह कदम व्यवस्था पर कटाक्ष के रूप में देखा गया।
कॉक्रोच शब्द का प्रयोग संभवतः उस सिस्टम के लिए किया गया, जो हर दरार में पनपता है और जिसे मिटाना मुश्किल होता है। इस विचित्र दल ने अपनी व्यंग्यात्मक शैली से मुख्यधारा की राजनीति और व्यवस्था की विफलता को आईना दिखाया, जिसने युवाओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
उधर, औपचारिक राजनीति में भी हलचल तेज रही। विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस, ने इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अन्य विपक्षी दलों ने एकजुट होकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की, इसे नैतिक जिम्मेदारी के साथ जोड़कर देखा गया।
विपक्ष का तर्क था कि एक ऐसी संस्था के लिए जो देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं का संचालन करती है, उसकी बार-बार की विफलताओं के लिए शीर्ष नेतृत्व को जवाबदेह होना ही चाहिए। यह पूरा घटनाक्रम भारतीय शिक्षा तंत्र के सामने एक गहरा संकट पेश करता है। जब तक परीक्षाओं के संचालन में पारदर्शिता नहीं होगी और एनटीए जैसी संस्थाओं के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ें नहीं खोदी जाएंगी, तब तक छात्रों का विश्वास बहाल नहीं हो पाएगा।
केवल सीबीआई जांच या इस्तीफों की मांग ही पर्याप्त नहीं है; आवश्यक यह है कि भविष्य में एक ऐसी सुरक्षा व्यवस्था बनाई जाए जिसमें सेंध लगाना असंभव हो। अन्यथा, पेपर लीक की यह संस्कृति न केवल मेधा को मार देगी, बल्कि शिक्षा प्रणाली के प्रति समाज का भरोसा भी पूरी तरह खत्म कर देगी।
कॉक्रोच जनता पार्टी का उदय इस बात का संकेत है कि अब युवा पीढ़ी केवल पारंपरिक विरोध प्रदर्शनों से संतुष्ट नहीं है। वे व्यवस्था के ढुलमुल रवैये से थक चुके हैं और अब व्यंग्य, तकनीक और डिजिटल सक्रियता के माध्यम से अपनी हताशा और गुस्से का इजहार कर रहे हैं। शिक्षा के इस महासमर में, जहां भविष्य दांव पर लगा है, व्यवस्था को यह समझना होगा कि अब उसे केवल आंकड़ों और सफाई से नहीं, बल्कि ठोस सुधारों से खुद को साबित करना होगा।
दूसरी तरफ कोटा की रैली में राहुल गांधी ने भी युवकों का ध्यान इस वजह से आकृष्ट करने में सफलता पायी क्योंकि उन्होंने इस जनसभा में कोई राजनीतिक बयान हीं दिया बल्कि देश में शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पर अपनी बातों को सीमित रखा। लिहाजा अब कांग्रेस भी इस मुद्दे पर बड़े पैमाने पर आंदोलन की तैयारियों में जुटी है। यह सारा कुछ मोदी सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं हैं क्योंकि अब मोर्चे पर वह युवा हैं जो टेक्नोलॉजी के खेल को अच्छी तरह जानते हैं। इन्होंने भाजपा के आईटी सेल के बाद जंतर मंतर पर गोदी मीडिया के एजेंडा को भी विफल कर दिया है।