महाराष्ट्र के बाद अब राजस्थान में ऑपरेशन लोटस की चर्चा
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लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है यह
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नागरिक और समाज सतर्क हो जाएं
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पेपर लीक के मुद्दे पर भी अपनी राय दी
राष्ट्रीय खबर
जयपुरः राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राजनीतिक दलों पर निर्वाचित प्रतिनिधियों को वस्तु की तरह इस्तेमाल करने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने दावा किया कि सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त एक सामान्य बात हो गई है, जो देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक बड़ा खतरा है।
राजस्थान में ऑपरेशन लोटस जैसी किसी कवायद के फिर से सक्रिय होने के सवालों पर जवाब देते हुए, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा कि राजनीतिक दलबदल का बढ़ता चलन लोकतांत्रिक सिद्धांतों के क्षरण का प्रतीक है। गहलोत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, आज सांसदों और विधायकों को उसी तरह खरीदा और बेचा जा रहा है जैसे घोड़ों, गधों, भैंसों और बकरियों का व्यापार होता है। उनका तर्क था कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को अब जनमत के संरक्षक के बजाय राजनीतिक बाजार की संपत्ति के रूप में देखा जा रहा है।
गहलोत ने कहा कि कई राज्यों में चल रहे घटनाक्रम लोकतांत्रिक संस्थानों को व्यवस्थित रूप से कमजोर करने की ओर इशारा करते हैं। हालिया राजनीतिक पुनर्गठन का जिक्र करते हुए उन्होंने दावा किया कि बड़े पैमाने पर दलबदल ने विधानसभाओं और संसदीय प्रतिनिधित्व की संरचना को इस तरह बदल दिया है कि यह भारत के लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर चिंता पैदा करता है। उन्होंने जन-जागरूकता को लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए अनिवार्य बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नागरिक, विशेषकर युवा, संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा के लिए सक्रिय नहीं हुए, तो देश के लोकतांत्रिक भविष्य को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे को कांग्रेस के संविधान बचाओ अभियान से जोड़ते हुए कोटा में हुए एक कार्यक्रम का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की उस आउटरीच पहल का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य युवाओं के मुद्दों को उठाना और उन्हें संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना है। कोटा के कार्यक्रम में नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के कारण छात्रों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव पर भी चर्चा हुई। गहलोत ने कहा कि वहां प्रतिभागियों को छात्रों से वसूले गए राजस्व और शिक्षा पर सरकारी खर्च का डेटा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि शिक्षा फंडिंग और खर्च के पैटर्न को लेकर युवाओं में बढ़ती जागरूकता अब सार्वजनिक नीति की प्राथमिकताओं पर सवाल उठा रही है। उन्होंने संग्रह और खर्च के बीच के अंतर को चिंताजनक बताते हुए कहा कि इस मुद्दे पर व्यापक सार्वजनिक जांच की आवश्यकता है।