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पूर्वोत्तर से अगले साल पूरी तरह हट जाएगा अफस्पा

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बड़ा बयान

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा है कि केंद्र सरकार अगले साल तक पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र से सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम, 1958 यानी अफस्पा को पूरी तरह से हटाने में सफल हो जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में यह कानून केवल एक या दो राज्यों के कुछ सीमित हिस्सों में ही प्रभावी रह जाएगा।

असम और नागालैंड के बीच तेल और प्राकृतिक गैस की खोज को लेकर हुए एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के बाद गृह मंत्री ने यह बयान दिया। उन्होंने कहा, अफस्पा के दायरे में आने वाले क्षेत्रों में कमी आना अपने आप में शांति का एक बड़ा संकेत है। मुझे पूरा विश्वास है कि शायद एक या दो राज्यों को छोड़कर, हम अगले साल तक पूरे पूर्वोत्तर से अफस्पा हटा देंगे। आज भी पूर्वोत्तर क्षेत्र का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इस कानून से पूरी तरह मुक्त हो चुका है।

गृह मंत्री अमित शाह ने इस बदलाव का श्रेय 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद से विभिन्न प्रतिबंधित और उग्रवादी संगठनों के साथ हस्ताक्षरित ऐतिहासिक शांति समझौतों को दिया। उन्होंने आगे कहा कि आज का दिन देश की प्रगति, पूर्वोत्तर की समृद्धि और आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को मजबूत करने के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। वैश्विक परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, हम सभी अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच चल रहे संघर्षों के कारण उत्पन्न गहरे वैश्विक संकट से वाकिफ हैं। ऊर्जा के बिना किसी भी देश का विकास संभव नहीं है। मुझे विश्वास है कि जब भी ऐसे वैश्विक संकट आएंगे, आज शुरू की गई यह घरेलू तेल खोज पहल भारत को महत्वपूर्ण राहत देगी और हमारी आत्मनिर्भरता को बढ़ाएगी।

गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सितंबर 2025 में ही मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में अफस्पा को और छह महीने के लिए बढ़ा दिया था। वर्तमान में मणिपुर के घाटी क्षेत्र के कुछ पुलिस थाना क्षेत्रों को छोड़कर राज्य के अधिकांश हिस्सों में यह लागू है। नागालैंड के भी कई जिलों और नामित पुलिस थानों में यह प्रभावी है, जबकि अरुणाचल प्रदेश के तिरप, चांगलांग, लोंगडिंग जिलों और नमसाई जिले के कुछ क्षेत्रों में यह कानून लागू है। त्रिपुरा (2015), मेघालय (2018) और मिजोरम (1980 के दशक) जैसे तीन पूर्वोत्तर राज्यों से इस कानून को पहले ही पूरी तरह से वापस लिया जा चुका है, और अब बाकी राज्यों से भी इसे जल्द हटाने की तैयारी है।