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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता में जर्मनी की हार

बर्लिन ने इसके लिए रूस पर मढ़ा दोष

एजेंसियां

बर्लिनः संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थायी सदस्यता हासिल करने की दौड़ में जर्मनी को मिली अप्रत्याशित हार ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। बुधवार शाम को हुए मतदान में जर्मनी, ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल से पिछड़ गया, जिसके बाद बर्लिन इसे अपने लिए एक कड़वी हार के रूप में देख रहा है। इस असफलता के लिए जर्मनी ने रूस की भूमिका और अपनी विदेश नीति के कुछ कड़े रुख को जिम्मेदार ठहराया है।

जर्मन विदेश मामलों के विशेषज्ञ जोहान वेडफुल ने स्पष्ट रूप से कहा कि यूक्रेन और इज़राइल के प्रति जर्मनी के अडिग समर्थन ने कई सदस्य देशों को नाराज किया, जिससे उसे जरूरी वोट नहीं मिल सके। वेडफुल के अनुसार, यह कोई गुप्त बात नहीं है कि रूस ने सुरक्षा परिषद में जर्मनी की आवाज को रोकने के लिए सक्रिय रूप से उसके खिलाफ माहौल तैयार किया। उनका मानना है कि रूस को परिषद में जर्मनी जैसा मुखर आलोचक स्वीकार्य नहीं था, विशेषकर यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में।

इसके अलावा, जर्मनी के लिए मध्य-पूर्व संघर्ष में इज़राइल के प्रति अपनी विशेष जिम्मेदारी का पालन करना भी भारी पड़ा। बर्लिन का तर्क है कि इस स्पष्ट रुख के कारण कई देशों ने जर्मनी के पक्ष में मतदान करने से परहेज किया। अपनी हार के पीछे जर्मनी ने एक और व्यावहारिक कारण भी माना है—सुरक्षा परिषद की दो साल की अवधि के लिए उसकी दौड़ में देर से प्रवेश।

मतदान के आंकड़ों पर गौर करें तो जर्मनी को 104 वोट मिले, जबकि ऑस्ट्रिया को 131 और पुर्तगाल को 134 मतों के साथ जीत हासिल हुई। इन परिणामों ने जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ के लिए भी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। घरेलू स्तर पर पहले से ही दबाव झेल रहे मर्ज़ को अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उन्होंने दुनिया भर में जर्मनी की छवि और प्रभाव को मजबूत करने का वादा किया था। हालांकि, मर्ज़ ने एक परिपक्व रुख अपनाते हुए ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल को बधाई दी और दोहराया कि जर्मनी अंतरराष्ट्रीय प्रणाली का एक भरोसेमंद स्तंभ बना रहेगा।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद दुनिया का एकमात्र निकाय है जिसके पास प्रतिबंध लगाने या बल प्रयोग को अधिकृत करने जैसे कानूनी रूप से बाध्यकारी निर्णय लेने की शक्ति है। ऐसे में जर्मनी का इस दौड़ से बाहर होना न केवल एक कूटनीतिक झटका है, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति समीकरणों की ओर भी इशारा करता है, जहां अंतरराष्ट्रीय मतभेदों के कारण प्रभावशाली देशों को भी अपनी जगह बनाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है।