पतियों के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कर रही पत्नियां
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दबाब और अनुचित लाभ की चाल
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एक साथ दस ऐसे मामले खारिज
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इसे पति के खिलाफ हथियार बना रही
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वैवाहिक और अन्य व्यक्तिगत विवादों की आड़ में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम के तहत झूठे और तुच्छ मामले दर्ज किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। अदालत ने चेतावनी दी है कि आपराधिक कानून का ऐसा दुरुपयोग न केवल निर्दोष व्यक्तियों के लिए गंभीर मानसिक व सामाजिक प्रताड़ना का कारण बनता है, बल्कि पूरी न्याय प्रणाली पर भी अनावश्यक बोझ डालता है।
एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि वैवाहिक विवादों की आढ़ में पतियों (जो अक्सर नाबालिग बच्चों, विशेषकर बेटियों के पिता भी होते हैं) के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत गंभीर आरोप लगाने के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है। अदालत के अनुसार, ऐसे संवेदनशील और कठोर कानूनों का इस्तेमाल कई बार वैवाहिक मुकदमों में अनुचित लाभ हासिल करने, भारी मौद्रिक समझौता (तलाक या गुजारा भत्ता के रूप में मोटी रकम) सुरक्षित करने, या विपक्षी दल को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर घुटने टेकने पर मजबूर करने के एक हथियार के रूप में किया जा रहा है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने इन टिप्पणियों के साथ एक पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की बलात्कार संबंधी धाराओं सहित 10 से अधिक आपराधिक मामलों को पूरी तरह से रद्द कर दिया। उक्त मामले में, पत्नी की ओर से दायर एक शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उसकी 14 वर्षीय बेटी के साथ उसके पति और जेठ/देवर ने बलात्कार किया था, और पति के अन्य परिवार वालों ने उसके साथ मारपीट की थी। अदालत ने पाया कि ये आरोप दुर्भावना से प्रेरित और पूरी तरह निराधार थे।
सर्वोच्च न्यायालय ने इसे वैवाहिक मुकदमों का बेहद घिनौना रूप करार देते हुए माता-पिता के आपसी झगड़ों में मासूम बच्चों को मोहरा बनाए जाने की निंदा की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां पॉक्सो कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है, वहीं इसका दुरुपयोग वास्तविक पीड़ितों के साथ भी अन्याय करता है क्योंकि इससे कानून की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।