डॉलर के मुकाबले शतक के कगार पर
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पंद्रह वर्षों में 52 रुपये का पतन
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इस सिंबल का वास्तुदोष हटाना होगा
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डॉ मनमोहन सिंह को पत्र लिखा था
सुदीप शर्मा चौधरी
गुवाहाटीः पूर्वोत्तर के प्रसिद्ध वास्तु सलाहकार और ‘रि-बिल्ड नॉर्थ ईस्ट’ के अध्यक्ष राजकुमार झाँझरी के अनुसार, भारतीय रुपये के वर्तमान प्रतीक चिन्ह (सिंबल) में गंभीर वास्तु दोष है। उनका दावा है कि यह सिंबल देश के आर्थिक विकास की पहचान बनने के बजाय इसके अवमूल्यन का कारण बन रहा है।
हाल ही में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के $96.40$ के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँचने के बाद, उन्होंने केंद्र सरकार से इस सिंबल को वास्तु दोष से मुक्त करने की पुनः अपील की है।आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि साल 2010 में नया सिंबल लागू होने से पहले के 63 वर्षों में रुपया केवल 44 रुपये ही गिरा था, जबकि सिंबल लागू होने के बाद मात्र 15 वर्षों में इसमें 52 रुपये की भारी गिरावट आई है। अगस्त 2010 में जब वित्त मंत्रालय ने इसे जारी किया था, तब प्रति डॉलर विनिमय दर 44 रुपये थी और देश की जीडीपी विकास दर 8.5 प्रतिशत थी।
सिंबल आने के बाद से देश की जीडीपी विकास दर घटकर 7 प्रतिशत के नीचे आ गई है। इस आर्थिक गिरावट के कारण भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य से पिछड़ गया है और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों के मुताबिक, ब्रिटेन से पीछे होकर छठे स्थान पर पहुंच गया है। वर्ष 2026 में रुपया एशिया के 48 देशों में सबसे कमजोर मुद्रा बन गया है।
रुपये को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पिछले वित्त वर्ष में रोजाना औसतन 13,260 करोड़ रुपये का बाजार हस्तक्षेप (विदेशी मुद्रा खर्च) किया गया, लेकिन इस गिरावट को रोका नहीं जा सका। श्री झाँझरी ने वर्ष 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिखकर इस वास्तु दोष के आर्थिक दुष्प्रभावों के प्रति सचेत किया था, परंतु इस पर कोई प्रशासनिक चर्चा नहीं हुई। विगत 30 वर्षों से हजारों परिवारों और मुख्यमंत्रियों तक को निशुल्क वास्तु सलाह दे चुके राजकुमार झाँझरी का मानना है कि देश की आर्थिक संप्रभुता और रुपये की साख को बचाने के लिए इस प्रतीक चिन्ह में सुधार करना बेहद आवश्यक है।