चौहत्तर हजार साल पहले धऱती पर आया था खतरा
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विनाश का पैमाना और जेनेटिक बॉटलनेक
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मानव आबादी घटकर दस हजार हो गयी
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अनुकूलन से ही बच पायी इंसानी प्रजाति
राष्ट्रीय खबर
रांचीः आज से लगभग 74,000 साल पहले, पृथ्वी ने पिछले 25 लाख वर्षों की सबसे शक्तिशाली ज्वालामुखीय आपदाओं में से एक का सामना किया था। टोबा सुपर-इरुप्शन, जो वर्तमान इंडोनेशिया के केंद्र में स्थित था, ने विनाश का ऐसा तांडव रचा कि वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके प्रभाव ग्रह के हर कोने तक पहुंचे थे। पुरातत्वविदों के लिए सबसे बड़ा सवाल हमेशा यही रहा है: जब टोबा विस्फोट 1980 के माउंट सेंट हेलेंस के विस्फोट से 10,000 गुना अधिक शक्तिशाली था, तो मानव जाति जीवित कैसे बची?
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इस महाविस्फोट ने समताप मंडल (स्टेटोस्फेयर) में लगभग 2,800 घन किलोमीटर राख उछाली और पीछे 100 गुणा 30 किलोमीटर का एक विशाल गड्ढा छोड़ दिया। वातावरण में फैली इस राख ने सालों तक सूरज की रोशनी को बाधित किया, जिससे वैश्विक स्तर पर भारी ठंड और ज्वालामुखीय शीतकाल की स्थिति पैदा हो गई। अम्लीय वर्षा ने जल स्रोतों को दूषित कर दिया और राख की मोटी परतों ने वनस्पतियों को दफन कर दिया।
वर्षों तक शोधकर्ताओं का मानना था कि इस घटना ने मनुष्यों को विलुप्ति की कगार पर धकेल दिया था। टोबा कैटास्ट्रोफी परिकल्पना के अनुसार, इस आपदा ने वैश्विक मानव आबादी को घटाकर 10,000 से भी कम कर दिया था। मानव डीएनए के अध्ययन भी एक जेनेटिक बॉटलनेक की ओर इशारा करते हैं, जहां किसी आपदा के कारण आबादी अचानक कम हो जाती है और आनुवंशिक विविधता घट जाती है।
ज्वालामुखीय कांच के सूक्ष्म कणों, जिन्हें क्रिप्टोटेफ्रा कहा जाता है, ने इस रहस्य को सुलझाने में मदद की। ये कण नग्न आंखों से अदृश्य होते हैं, लेकिन इनकी रासायनिक जांच से वैज्ञानिक यह जान पाए कि राख की कौन सी परत टोबा विस्फोट की है। दक्षिण अफ्रीका के पिनेकल पॉइंट और इथियोपिया के शिन्फा-मेटेमा 1 जैसे स्थलों पर पुरातत्वविदों को चौंकाने वाले प्रमाण मिले। टोबा की राख वाली परतों के पहले, दौरान और बाद में भी मानव गतिविधियों के निरंतर संकेत मिले।
सबूत बताते हैं कि आपदा ने मनुष्यों को खत्म करने के बजाय उन्हें और अधिक नवाचारी बना दिया। इथियोपिया में, लोगों ने सूखे के दौरान मछली पकड़ने के नए तरीके अपनाए और उसी समय के आसपास धनुष-बाण जैसी तकनीक विकसित की। मनुष्य मौसमी नदियों और जलस्रोतों के अनुसार खुद को ढालने लगे। इंडोनेशिया, भारत और चीन के साक्ष्य भी यही दर्शाते हैं कि प्राचीन मानव हमारी कल्पना से कहीं अधिक अनुकूलनशील थे। आज हम ज्वालामुखीय खतरों की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक से लैस हैं, लेकिन टोबा की कहानी हमें सिखाती है कि अस्तित्व की असली कुंजी बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता में निहित है।
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