तमिलनाडु में कम सीट पाने के बाद एआईएडीएमके का फैसला
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टीवीके के उदय से राज्य की राजनीतिक बदली
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दोनों द्रमुक दलों के आपसी तालमेल की चर्चा
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डीएमके ने कांग्रेस की जोरदार आलोचना कर दी
राष्ट्रीय खबर
चेन्नई: दक्षिण भारत की राजनीति का केंद्र माने जाने वाले तमिलनाडु में इस समय एक अभूतपूर्व राजनीतिक भूचाल आया हुआ है। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों ने राज्य के दशकों पुराने स्थापित समीकरणों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। चुनावों में उम्मीद के मुताबिक सफलता न मिलने और करारी हार का सामना करने के बाद, ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी के साथ अपने सभी रिश्ते तोड़ने का एलान कर दिया है। यह घोषणा केवल एक गठबंधन की समाप्ति नहीं है, बल्कि अन्नाद्रमुक द्वारा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से भी पूरी तरह बाहर निकलने का स्पष्ट संकेत है।
अन्नाद्रमुक और भाजपा के बीच के रिश्तों की कहानी हमेशा से ही नाटकीय रही है। यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो साल 1999 की वह घटना आज भी भारतीय राजनीति में याद की जाती है, जब जे. जयललिता के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक ने केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था। उस समय मात्र एक वोट से केंद्र सरकार गिर गई थी, जिसके बाद देश को मध्यावधि चुनावों का सामना करना पड़ा था।
दशकों के अंतराल और वैचारिक मतभेदों के बावजूद, साल 2026 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दोनों दलों ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के विजय रथ को रोकने के लिए हाथ मिलाया था। इस गठबंधन के लिए भाजपा ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए अन्नाद्रमुक की कई कड़ी और विवादास्पद शर्तों को स्वीकार किया था, ताकि राज्य में अपनी जड़ें जमा सके। हालांकि, चुनावी परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि तमिलनाडु की जनता ने इस बेमेल गठबंधन को नकार दिया है। पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे को देखते हुए अन्नाद्रमुक नेतृत्व ने अब एकला चलो की राह पकड़ने का फैसला किया है।
तमिलनाडु की राजनीति में दूसरा बड़ा मोड़ तब आया जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगी डीएमके का साथ छोड़ दिया। कांग्रेस ने राज्य में एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए सुपरस्टार विजय की नवनिर्मित पार्टी तमिझगा वेत्री कड़गम को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी। विजय की पार्टी ने अपनी पहली ही चुनावी परीक्षा में बहुमत के आंकड़े को छूकर सभी को हैरान कर दिया है।
कांग्रेस के इस पाला बदलने से राज्य की सत्ताधारी पार्टी डीएमके में भारी आक्रोश है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके ने इस कदम को राष्ट्रीय स्तर पर बने इंडिया गठबंधन के लिए ताबूत की आखिरी कील बताया है। डीएमके ने आधिकारिक तौर पर घोषणा कर दी है कि तमिलनाडु में अब इंडिया गठबंधन का अस्तित्व समाप्त हो चुका है।
कांग्रेस के इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए डीएमके ने इसे घोर राजनीतिक विश्वासघात करार दिया है। चेन्नई में आयोजित पार्टी की एक उच्चस्तरीय आपात बैठक में चार प्रमुख निंदा प्रस्ताव पारित किए गए। द्रमुक नेतृत्व ने कड़े शब्दों में कहा कि कांग्रेस ने संकट के समय अपना असली रंग दिखा दिया है। प्रस्ताव में यह भी उल्लेख किया गया कि कांग्रेस आज वही आचरण कर रही है, जिसके लिए वह अन्य राज्यों में भाजपा को गठबंधन विरोधी बताकर उसकी आलोचना करती है।
इस राजनीतिक उठापटक ने तमिलनाडु की राजनीति को एक ऐसे मुकाम पर खड़ा कर दिया है, जहाँ पुराने दिग्गज अब रक्षात्मक मुद्रा में हैं, जबकि एक नई शक्ति (विजय की टीवीके) और बदलते गठबंधन के साथी राज्य की दिशा तय करने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस-टीवीके की यह नई केमिस्ट्री तमिलनाडु के भविष्य को स्थायी स्थिरता प्रदान कर पाएगी या राज्य एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता के दौर में जाएगा।