मणिपुर में शांति बहाली में विफलता पर उपजी नाराजगी
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तीन साल से राज्य में अशांत स्थिति
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सभी को फिर से जनादेश लेना चाहिए
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गलती के लिए जवाबदेही तो तय हो
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः मणिपुर में 3 मई, 2023 को भड़की जातीय हिंसा के तीन साल पूरे होने पर राजनीति गरमा गई है। मणिपुर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के. मेघचंद्र ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा है कि यदि निर्वाचित सरकार पिछले तीन वर्षों में राज्य में शांति, न्याय और सामान्य स्थिति बहाल करने में विफल रही है, तो सभी विधायकों और प्रतिनिधियों को अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने मांग की कि सत्ता में बैठे लोगों को जनता के बीच जाकर एक नया जनादेश मांगना चाहिए, क्योंकि राज्य की वर्तमान स्थिति शासन पर से जनता के विश्वास को कमजोर कर रही है।
मेघचंद्र ने जोर देकर कहा कि नेतृत्व के साथ जिम्मेदारी जुड़ी होती है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इतने लंबे समय के बाद भी किसी स्थायी समाधान तक नहीं पहुँच पाई है, तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। उनके अनुसार, इस्तीफा देना कोई कमजोरी नहीं बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा, चुने हुए प्रतिनिधियों को जनता के साथ खड़ा होना चाहिए, न कि उस समय निष्क्रिय रहना चाहिए जब राज्य पीड़ा झेल रहा हो। सार्वजनिक सेवा का अर्थ केवल पद पर बने रहना नहीं बल्कि जवाबदेह होना है। यदि सरकार शांति और विश्वास बहाल नहीं कर सकती, तो उसे हट जाना चाहिए और लोगों को अपना भविष्य तय करने का मौका देना चाहिए।
कांग्रेस नेता ने अत्यंत दुख के साथ उल्लेख किया कि मणिपुर के लोगों ने पिछले तीन वर्षों में असहनीय कष्ट सहे हैं। इस हिंसा में अब तक 250 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और लगभग 60,000 से अधिक नागरिक विस्थापित होकर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। समुदायों के बीच पैदा हुई गहरी खाई और शासन के प्रति घटते भरोसे ने राज्य के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब शांति और न्याय इतने समय तक नदारद रहे, तो मौन और निष्क्रियता इसका उत्तर नहीं हो सकते।
मणिपुर में जारी इस जातीय संघर्ष ने न केवल राज्य की कानून-व्यवस्था को प्रभावित किया है, बल्कि इसकी अर्थव्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था को भी गहरे संकट में डाल दिया है। मेघचंद्र का यह आह्वान ऐसे समय में आया है जब राज्य के लोग शांतिपूर्ण जीवन की वापसी के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। विपक्ष का तर्क है कि बार-बार की जा रही अपीलों और केंद्र के हस्तक्षेप के बावजूद जमीनी स्तर पर हिंसा की घटनाएं पूरी तरह नहीं थमी हैं। यह मांग राज्य सरकार पर दबाव बढ़ाने के साथ-साथ आगामी राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकती है, क्योंकि जनता अब ठोस समाधान और जवाबदेही की मांग कर रही है।