पूरा देश व्यस्त रहा चुनावी धमाकों को लेकर
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: भारत की समुद्री रक्षा क्षमता को एक बड़ी मजबूती देते हुए, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित लंबी दूरी की हाइपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल का दूसरा सफल उड़ान परीक्षण किया गया है। सूत्रों के अनुसार, यह परीक्षण शुक्रवार को ओडिशा तट पर आयोजित किया गया।
1,500 किलोमीटर से अधिक की मारक क्षमता और मैक 10 (ध्वनि की गति से 10 गुना) की अविश्वसनीय गति वाली यह मिसाइल भारत की समुद्री रक्षा सीमा को गहरे समुद्र तक फैला देती है। इतनी उच्च गति और मारक क्षमता के कारण यह मिसाइल भारत के प्रतिद्वंद्वी देशों, विशेषकर चीन और पाकिस्तान के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकती है। इस दूसरे परीक्षण का मुख्य केंद्र टू-स्टेज हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल डिजाइन का मूल्यांकन करना था।
यद्यपि डीआरडीओ और रक्षा मंत्रालय ने इस परीक्षण को लेकर अभी आधिकारिक चुप्पी साधी हुई है, लेकिन शनिवार को भारतीय जनता पार्टी ने अपने आधिकारिक एक्स (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर इस मिसाइल परीक्षण का एक वीडियो साझा किया। पोस्ट में लिखा गया, भारत की हाइपरसोनिक बढ़त और भी तेज हो गई है। ओडिशा तट से डीआरडीओ का एलआर-एएसएचएम चरण-2 परीक्षण एक नए युग का संकेत है। प्रधानमंत्री मोदी के आत्मनिर्भर और भविष्य के लिए तैयार भारत के दृष्टिकोण को दर्शाते हुए, यह स्वदेशी रक्षा नवाचार में एक शक्तिशाली छलांग है।
यह मिसाइल अधिकतम मैक 10 की गति तक पहुँचने के लिए डिज़ाइन की गई है, जबकि अपने ग्लाइड चरण के दौरान यह औसतन मैक 5.0 की गति बनाए रख सकती है। इस गति के कारण यह आधुनिक जहाज-आधारित इंटरसेप्शन (अवरोधन) और रडार प्रणालियों को चकमा देने में सक्षम है।
रक्षा मंत्रालय ने 14 नवंबर, 2024 को मिसाइल के पहले परीक्षण के दौरान इसे कैरियर-किलर (विमानवाहक पोत नाशक) की क्षमता वाला बताया था। यह मिसाइल दो चरणों वाले ठोस रॉकेट पर आधारित है। अपनी बेजोड़ गति के अलावा, इसकी विशेषता इसका अप्रत्याशित और रडार से बचने वाला स्किपिंग ट्रेजेक्टरी (उछलने वाला पथ) है। यह स्वदेशी रूप से विकसित सेंसरों का उपयोग करके विमानवाहक पोतों जैसे चलते हुए लक्ष्यों को भी उच्च सटीकता के साथ निशाना बना सकती है।
इस मिसाइल का पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन इसी वर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड के दौरान किया गया था। इसे हैदराबाद स्थित डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम मिसाइल कॉम्प्लेक्स और अन्य डीआरडीओ प्रयोगशालाओं ने औद्योगिक भागीदारों के साथ मिलकर विकसित किया है, जो रक्षा तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है।