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मुर्शिदाबाद में चुनाव अधिकारी को निरूत्तर कर दिया महिला ने

आखिर इतने नाम काटे ही क्यों जा रहे हैं

  • ग्रामीण महिला के सवाल से चुप हो गये अफसर

  • दस्तावेज जमा किये थे तो नाम कैसे काटे गये

  • मुस्लिम इलाकों से ही क्यों ज्यादा नाम हटे हैं

राष्ट्रीय खबर

मुर्शिदाबादः पश्चिम बंगाल में चुनावी बयार के बीच मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का मुद्दा अब गलियों और मोहल्लों तक पहुँच गया है। शनिवार को मुर्शिदाबाद के बेलडांगा स्थित महेशतला गांव में एक बेहद दिलचस्प और साहसी दृश्य देखने को मिला, जब 32 वर्षीय एक साधारण गृहिणी तस्लीमा बीवी ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल के सामने खड़े होकर सीधे सवाल दाग दिए। सशस्त्र केंद्रीय बलों से घिरे सीईओ जब इलाके में चुनावी तैयारियों का जायजा लेने पहुंचे थे, तब उन्हें उम्मीद नहीं थी कि एक ग्रामीण महिला उन्हें इस तरह कटघरे में खड़ा कर देगी।

तस्लीमा बीवी ने सीईओ से दो टूक पूछा कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान वास्तविक मतदाताओं के नाम क्यों हटा दिए गए। उन्होंने कहा, जब इन लोगों के पास आयोग द्वारा मांगे गए 16 दस्तावेजों में से कम से कम दो या तीन वैध दस्तावेज मौजूद हैं, तो उनके नाम सूची में क्यों नहीं होने चाहिए? तस्लीमा ने हाथ के इशारों से अपनी बात पर जोर देते हुए कहा कि वह नहीं चाहतीं कि मतदान के दिन कुछ लोग खुशी-खुशी वोट डालें और कुछ अपने अधिकार छिन जाने पर आंसू बहाएं। उन्होंने जोर देकर कहा कि गांव में कोई डर का माहौल नहीं है, असली समस्या मतदाता सूची से नाम गायब होना है।

सीईओ मनोज अग्रवाल तस्लीमा की मुखरता देख थोड़े असहज नजर आए। उन्होंने स्थिति संभालते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार न्यायिक अधिकारियों ने इन मामलों का निपटारा किया है और नामों को हटाने का निर्णय उन्हीं का था। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि वह इस मामले में जो संभव होगा, वह करेंगे। गौर करने वाली बात यह है कि तस्लीमा के अपने बूथ (संख्या 158) पर पहले 600 मतदाता थे, जो अब घटकर 505 रह गए हैं। अकेले न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से वहां से 63 नाम हटाए गए हैं।

मुर्शिदाबाद, जो एक मुस्लिम बहुल जिला है, वहां बंगाल के अन्य जिलों की तुलना में सबसे अधिक नाम काटे गए हैं। आंकड़ों के अनुसार, जिले में पहले 57.64 लाख से अधिक मतदाता थे, लेकिन पुनरीक्षण के बाद अब केवल 50.26 लाख मतदाता ही 23 अप्रैल को मतदान कर सकेंगे। तस्लीमा के पड़ोसी राजू शेख जैसे कई लोग अब ट्रिब्यूनल के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन वर्तमान स्थिति में उनके लिए इस चुनाव में मतदान करना लगभग असंभव लग रहा है। यह घटना दर्शाती है कि चुनाव केवल राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि आम नागरिकों के उन अधिकारों का भी है, जिसके लिए वे अब जागरूक होकर प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं।