Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
मध्य प्रदेश में 'ई-प्रवेश' प्रणाली ने बनाया रिकॉर्ड: डॉ. मोहन यादव के विजन से 4.89 लाख छात्रों ने लि... जबलपुर में महिला आरक्षक से पहचान छिपाकर दुष्कर्म और धर्मांतरण का दबाव, एसपी दफ्तर पहुंची पीड़िता “मेरा बेटा राह भर तड़पता रहा...”, मंडला में 108 एंबुलेंस की घोर लापरवाही से 21 साल के युवक की तड़पकर... उज्जैन बनेगी देश की पहली 'सर्प मित्र नगरी': 15 करोड़ की लागत से बनेगा आधुनिक स्नेक पार्क, जानें खूबि... नेपाल में कांवड़ यात्रा से पहले झंडे को लेकर भड़की हिंसा: भारत सीमा से लगे 5 जिलों में कर्फ्यू, सरका... केंद्र सरकार का बड़ा फैसला: अगले 5 सालों के लिए बढ़ी 'पीएम-किसान' योजना, ₹3.15 लाख करोड़ के बजट को म... भारत में गूगल ने लॉन्च किया Gemini Spark AI एजेंट! आपके बिना ऑनलाइन रहे भी करेगा सारे काम, जानें खास... सावन में करें श्री रुद्राष्टकम स्तोत्र का पाठ: दूर होंगे सभी कष्ट, जानें श्रीराम से जुड़ी कथा, सही स... अर्ली मेनोपॉज और हाई ब्लड प्रेशर का क्या है कनेक्शन? एक्सपर्ट से जानें एस्ट्रोजन हार्मोन का असर और ब... IB अफसर अंकित शर्मा हत्याकांड: ताहिर हुसैन समेत 5 को उम्रकैद, जानें किन पुख्ता सबूतों पर कोर्ट ने सु...

कांग्रेस के चर्चित नेता शशि थरूर ने नया सवाल किया

भारत अपने स्वर्ण भंडार को निकालता क्यों नहीं

  • अब भी विदेशों से भारी आयात

  • आयात से विदेशी पूंजी निकलती है

  • देश के खनन नियम अत्यंत जटिल है

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः लेखक और सांसद शशि थरूर ने भारत की आर्थिक नीतियों पर एक तीखा प्रहार करते हुए देश के स्वर्ण विरोधाभास को उजागर किया है। भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ सोना केवल एक धातु नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक आवश्यकता और संकट के समय का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच माना जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि अपनी विशाल खनिज संपदा के बावजूद, भारत अपनी स्वर्ण मांग को पूरा करने के लिए विदेशी खानों पर निर्भर है।

भारत के पास अनुमानित 500 मिलियन टन स्वर्ण अयस्क का भंडार है, लेकिन घरेलू उत्पादन वैश्विक पटल पर नगण्य है। भारत प्रति वर्ष बमुश्किल 1.5 टन सोने का खनन करता है। इसके विपरीत, अपनी खपत को पूरा करने के लिए हम ऑस्ट्रेलिया, घाना और पेरू जैसे देशों से सालाना सैकड़ों टन सोना आयात करते हैं। थरूर के अनुसार, यह स्थिति केवल एक विडंबना नहीं है, बल्कि एक स्व-निर्मित घाव है, जो हमारी आर्थिक संप्रभुता को कमजोर कर रहा है।

अपने लेख में उन्होंने इस बात पर जोर दिया गया है कि भारतीय राज्य ने दशकों से स्वर्ण खनन को रणनीतिक प्रचुरता के बजाय कमी और संदेह की दृष्टि से देखा है। एक संभावित खनन कंपनी के लिए भारत का नियामक ढांचा किसी भूलभुलैया से कम नहीं है। प्रारंभिक परमिट से लेकर अंतिम खनन पट्टे तक की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि यह प्रभावी रूप से निषेध का काम करती है।

अस्पष्ट मंजूरी: पर्यावरण संबंधी मंजूरी की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और क्षेत्राधिकारों का आपस में टकराव निवेशकों को हतोत्साहित करता है। भारत का खनन कोड अभी भी औपनिवेशिक काल की नौकरशाही जड़ता में फंसा हुआ है, जहाँ हर खनिज भंडार को एक राष्ट्रीय संपत्ति के बजाय संभावित घोटाले के रूप में देखा जाता है। गहरे कुएं के खनन के लिए अरबों डॉलर की पूंजी और उन्नत तकनीक की आवश्यकता होती है। जहाँ अन्य देशों ने अपने खनन कानूनों को सरल बनाकर वैश्विक निवेश आकर्षित किया है, वहीं भारत का कर ढांचा उन जोखिम लेने वालों को ही दंडित करता है जिन्हें वास्तव में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

शशि थरूर का यह लेख एक स्पष्ट चेतावनी है। यदि भारत को एक महाशक्ति के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करनी है, तो उसे अपनी जमीन के नीचे दबे सोने को बाहर निकालना होगा। यह न केवल हमारे विदेशी मुद्रा भंडार को बचाएगा, बल्कि खनन क्षेत्र में रोजगार के व्यापक अवसर भी पैदा करेगा। सोने के प्रति हमारी सभ्यतागत दीवानगी को अब एक कुशल औद्योगिक नीति में बदलने की आवश्यकता है।