रूस-चीन की धुरी से ट्रंप की बढ़ती मुश्किलें
इस महीने की शुरुआत में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी संघर्ष को एक लिटिल एक्सकर्शन करार दिया था, तब उन्होंने शायद यह कल्पना नहीं की थी कि यह भ्रमण उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा। फ्लोरिडा में रिपब्लिकन सांसदों को संबोधित करते हुए ट्रंप ने बड़े आत्मविश्वास से कहा था कि बुराई को खत्म करने के लिए शुरू किया गया यह अभियान बहुत जल्द समाप्त हो जाएगा।
लेकिन आज यह युद्ध अपने तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है, और जमीन पर हालात यह बता रहे हैं कि ईरान न केवल डटा हुआ है, बल्कि वह इस युद्ध की दिशा, दशा और अवधि को अपने अनुसार मोड़ने की क्षमता भी दिखा रहा है। यह सच है कि ईरान ने इस युद्ध के शुरुआती दौर में अपूरणीय क्षति झेली है।
युद्ध के पहले ही दिन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और 40 से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों की हत्या, और उसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अली लारीजानी व खुफिया मंत्री इस्माइल खतीब का मारा जाना किसी भी शासन की कमर तोड़ने के लिए पर्याप्त था। इजराइल की शासन का सिर कलम करने की नीति का उद्देश्य ईरान के भीतर विद्रोह भड़काना था, लेकिन इसके विपरीत, ईरान की जवाबी कार्रवाई और भी आक्रामक हो गई है।
ट्रंप अब स्वीकार कर रहे हैं कि वे ईरान के पलटवार से हैरान हैं, जबकि उनके सैन्य कमांडरों ने उन्हें ठीक इसी परिदृश्य की चेतावनी दी थी। ट्रंप की इस हैरानी का मुख्य कारण वह अदृश्य समर्थन है जो तेहरान को मॉस्को और बीजिंग से मिल रहा है। सार्वजनिक मंचों पर रूस और चीन ने भले ही केवल राजनयिक समर्थन दिया हो और हमलों की निंदा की हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन दोनों महाशक्तियों ने ईरान को वह सामरिक कवच प्रदान किया है जिसने अमेरिकी सैन्य शक्ति की धार को कुंद कर दिया है।
अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, रूस ने ईरान को वह आंखें प्रदान की हैं जिनसे वह मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और युद्धपोतों की सटीक लोकेशन देख पा रहा है। इसका सबसे घातक परिणाम कुवैत में एक अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हुए ड्रोन हमले के रूप में दिखा, जिसमें छह अमेरिकी सैनिक मारे गए। यह स्पष्ट रूप से रूस द्वारा यूक्रेन युद्ध का बदला लेने की कोशिश है।
जिस प्रकार अमेरिका ने यूक्रेन को रूसी ठिकानों की जानकारी देकर हजारों रूसी सैनिकों को मरवाया, अब पुतिन वही फॉर्मूला ईरान के माध्यम से अमेरिका पर आजमा रहे हैं। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल ही में स्वीकार किया कि रूस और चीन के साथ उनका सैन्य सहयोग केवल पुराना ही नहीं, बल्कि वर्तमान युद्ध में भी पूरी तरह सक्रिय है।
जहाँ रूस का समर्थन अधिक प्रत्यक्ष और आक्रामक है, वहीं चीन की रणनीति अधिक सूक्ष्म और व्यापारिक हितों से प्रेरित है। बीजिंग ने पिछले एक दशक में ईरान के मिसाइल तकनीक, उपग्रह कार्यक्रम, साइबर युद्ध और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों को विकसित करने में भारी निवेश किया है। युद्ध शुरू होने से ठीक पहले चीन द्वारा ईरान को सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइलों और आक्रामक ड्रोनों की बिक्री की खबरें आई थीं।
अमेरिकी कांग्रेस को रिपोर्ट करने वाले आयोग के अनुसार, चीन ने ईरान को अपने बेइदोउ उपग्रह नेविगेशन सिस्टम तक पूर्ण सैन्य पहुंच प्रदान की है। केवल फरवरी 2025 में दी गई खेप ही 200 से 300 हज कासिम और खैबर शेकन मिसाइलों को दागने के लिए पर्याप्त थी। चीन केवल सैन्य रूप से ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी ईरान का सबसे बड़ा सहारा बना हुआ है।
ईरान के 80 प्रतिशत से अधिक तेल का खरीदार होने के नाते चीन उसे अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार करने में मदद कर रहा है। वर्तमान संघर्ष में चीन पहला ऐसा देश है जिसके तेल टैंकरों को ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी है। यह दर्शाता है कि बीजिंग और तेहरान के बीच का गठबंधन कितना गहरा है।
साइबर मोर्चे पर भी, चीन की मदद से ईरान ने एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया है जिसे पूरी तरह नष्ट करना इजराइल और अमेरिका के लिए लगभग असंभव साबित हो रहा है। यद्यपि इजराइल ने कई ईरानी साइबर विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों को निशाना बनाया है, लेकिन ईरान की डिजिटल रक्षा दीवार अभी भी मजबूती से खड़ी है।
डोनाल्ड ट्रंप के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति से नहीं लड़ रहे, बल्कि वे रूस और चीन द्वारा समर्थित एक प्रतिरोधी धुरी का सामना कर रहे हैं। उनके विरोधियों ने टिप्पणी कि ट्रंप ने इजराइली लॉबी के दबाव में यह युद्ध शुरू किया है, इस बात की पुष्टि करती है कि व्हाइट हाउस के भीतर भी इस युद्ध को लेकर गहरी असहमति है।