सिर्फ टैरिफ नहीं बल्कि ईरान युद्ध पर भी गंभीर वार्ता होगी
पेरिस: वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, आज शाम पेरिस के एक सुरक्षित और उच्च-स्तरीय राजनयिक स्थल पर अमेरिका और चीन के बीच व्यापार वार्ता का एक महत्वपूर्ण चरण शुरू हुआ। यह बैठक एक ऐसे नाजुक समय में हो रही है जब पश्चिम एशिया (ईरान-इजरायल) में भड़कते संघर्ष और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिरता के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन और शी जिनपिंग सरकार के बीच जारी यह संवाद केवल आर्थिक लेन-देन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले हफ्तों में बीजिंग में प्रस्तावित महाशक्तियों के शिखर सम्मेलन की आधारशिला रखने का प्रयास है।
इस द्विपक्षीय वार्ता का प्राथमिक एजेंडा अमेरिका द्वारा चीनी आयात पर लगाए गए नए टैरिफ और लगातार बढ़ते व्यापार घाटे को कम करना है। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाणिज्य सचिव कर रहे हैं, जो अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र की सुरक्षा और बौद्धिक संपदा के संरक्षण पर कड़ा रुख अपनाए हुए हैं। वहीं, चीन की ओर से उप-प्रधानमंत्री स्तर के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य चीनी तकनीक पर लगे निर्यात प्रतिबंधों को हटवाना और वैश्विक बाजार में अपनी कंपनियों के लिए सुगम रास्ता बनाना है।
विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि इस बार की मेज पर चर्चा केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। ईरान और इजरायल के बीच जारी युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन (आपूर्ति श्रृंखला) को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस संदर्भ में, अमेरिका चाहता है कि चीन वैश्विक सुरक्षा मामलों में अपनी भूमिका और अधिक स्पष्ट करे, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां उसकी ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक मार्ग सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं। लाल सागर में जारी व्यवधानों ने दोनों देशों को वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों और सुरक्षित निवेश पर बात करने के लिए मजबूर किया है।
इस वार्ता के परिणाम न केवल इन दो आर्थिक दिग्गजों के भविष्य को परिभाषित करेंगे, बल्कि भारत जैसे उभरते बाजारों सहित दुनिया भर के शेयर बाजारों को भी दिशा देंगे। यदि पेरिस वार्ता किसी सकारात्मक समझौते की ओर बढ़ती है, तो यह वैश्विक महंगाई को कम करने और व्यापारिक समीकरणों को स्थिरता देने में मदद कर सकती है। दुनिया भर के निवेशक इस समय पेरिस से आने वाली घोषणाओं पर नजरें गड़ाए हुए हैं।