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दिल्ली आबकारी नीति मामले में न्यायमूर्ति शर्मा का फैसला

निचली अदालत के फैसले पर रोक लगायी

  • सीबीआई को भी अस्थायी राहत मिली

  • निचली अदालत ने केस ही खारिज किया है

  • अब तक ठोस साक्ष्य कुछ भी नहीं मिला

राष्ट्रीय खबर

एक महत्वपूर्ण मोड़ पर, दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को स्पष्ट किया कि वह निचली अदालत द्वारा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के अधिकारियों के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों पर रोक लगाएगा। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने सीबीआई द्वारा दायर उस पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया सहित अन्य आरोपियों को आरोपमुक्त करने के फैसले को चुनौती दी गई है।

न्यायमूर्ति शर्मा ने स्पष्ट रूप से कहा, मैं जांच एजेंसी के खिलाफ की गई सभी टिप्पणियों और बयानों पर रोक लगाऊंगी। इससे पहले, राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने अपने फैसले में सीबीआई की जांच को पूर्व-निर्धारित और नियोजित अभ्यास बताया था और जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की सिफारिश की थी। निचली अदालत ने कहा था कि यह जांच केवल त्रुटिपूर्ण नहीं थी, बल्कि यह संस्थागत कदाचार की श्रेणी में आती है।

हाईकोर्ट ने अब इस मामले में सभी आरोपियों को नोटिस जारी किया है और प्रवर्तन निदेशालय के धन शोधन मामले की कार्यवाही को भी तब तक स्थगित करने का निर्देश दिया है, जब तक कि वह सीबीआई की इस याचिका पर सुनवाई पूरी नहीं कर लेती।

सीबीआई ने अपनी लिखित दलीलों में निचली अदालत के फैसले को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण बताते हुए कई गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं। सीबीआई का कहना है कि निचली अदालत ने आरोप तय करने के चरण में ही मिनी ट्रायल शुरू कर दिया, जो कानूनन गलत है। एजेंसी के अनुसार, अदालत ने धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज गवाहों और सरकारी गवाहों के बयानों को अविश्वसनीय मानकर खारिज कर दिया।

कानूनी सिद्धांतों का उल्लंघन: स्थापित सिद्धांत है कि आरोप तय करने के चरण में अभियोजन पक्ष की सामग्री को सच मानकर विचार किया जाना चाहिए, लेकिन अदालत ने गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। सीबीआई ने दलील दी कि साजिश हमेशा गुप्त रूप से रची जाती है और इसके लिए सीधे सबूतों (मीटिंग या कैश ट्रांजैक्शन) की अनुपस्थिति का मतलब यह नहीं कि साजिश नहीं हुई।

यह पूरा विवाद जुलाई 2022 में दिल्ली के मुख्य सचिव की उस रिपोर्ट से शुरू हुआ था, जिसमें आबकारी नीति 2021-22 के निर्माण में प्रक्रियागत खामियों और करीब 580 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का आरोप लगाया गया था। इसके बाद उपराज्यपाल की सिफारिश पर सीबीआई और ईडी ने समानांतर जांच शुरू की थी। 27 फरवरी 2026 को निचली अदालत ने यह कहते हुए केजरीवाल और अन्य को रिहा कर दिया था कि नीति में कोई बड़ी आपराधिक साजिश या मंशा नजर नहीं आती।