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सीबीआई का मामला न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के पास

सुनवाई से पहले ही जज को लेकर बहसबाजी जारी

  • आगामी 9 मार्च को होगी सुनवाई

  • निचली अदालत से केस खारिज किया

  • जांच एजेंसी ने ऊपर अपील दायर की है

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: दिल्ली आबकारी नीति मामले में आम आदमी पार्टी के नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य को आरोपमुक्त किए जाने के खिलाफ सीबीआई की अपील पर 9 मार्च को होने वाली सुनवाई ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। न्यायमूर्ति शर्मा ने पूर्व में भी इसी मामले से जुड़े ‘आप’ नेताओं के खिलाफ कई महत्वपूर्ण फैसले सुनाए हैं।

केंद्रीय एजेंसी की यह अपील विशेष सीबीआई न्यायाधीश जितेंद्र सिंह द्वारा पिछले शुक्रवार को राउज एवेन्यू कोर्ट में दिए गए 598 पन्नों के आदेश को चुनौती देती है। विशेष न्यायाधीश ने यह कहते हुए कि मामले में कोई भी ठोस सामग्री नहीं है, केजरीवाल और 22 अन्य को आरोपमुक्त कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने मामले को मुकदमे तक ले जाने से रोकते हुए जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली की आलोचना की थी और कहा था कि बिना किसी औचित्य के और लंबे समय तक वादामाफ गवाह के बयान बार-बार दर्ज करना अनुचित है।

न्यायाधीश सिंह ने अपने आदेश में कहा, यदि इस तरह के आचरण को अनियंत्रित छोड़ दिया गया, तो क्षमादान की असाधारण व्यवस्था सत्य की खोज के बजाय नैरेटिव बनाने का उपकरण बन जाएगी, जिससे आरोपियों के हितों को गंभीर नुकसान पहुँचेगा और आपराधिक न्याय प्रक्रिया में विश्वास कम होगा।

सीबीआई ने इस आदेश को स्पष्ट रूप से अवैध और त्रुटिपूर्ण बताते हुए उच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दायर की है। एजेंसी का तर्क है कि विशेष न्यायाधीश ने अभियोजन पक्ष के मामले को चुनिंदा तरीके से पढ़ा और आरोपियों की संलिप्तता दिखाने वाली सामग्री की अनदेखी की है।

दिल्ली उच्च न्यायालय की वेबसाइट के अनुसार, न्यायमूर्ति शर्मा वर्तमान में मौजूदा/पूर्व सांसदों और विधायकों से संबंधित आपराधिक मामलों की सुनवाई करने वाली एकमात्र न्यायाधीश हैं। उनके पिछले फैसलों, विशेषकर अप्रैल 2024 में केजरीवाल की गिरफ्तारी को वैध ठहराने वाले आदेश ने काफी ध्यान आकर्षित किया था।

उस समय न्यायमूर्ति शर्मा ने 106 पन्नों के आदेश में स्पष्ट किया था, यह अदालत कानून की दो अलग-अलग श्रेणियाँ निर्धारित नहीं करेगी—एक आम नागरिकों के लिए और दूसरी किसी मुख्यमंत्री या सत्ता में बैठे व्यक्ति को विशेष विशेषाधिकार देने के लिए। अदालत ने नोट किया था कि छह महीनों में नौ समन जारी होने के बावजूद केजरीवाल जांच में शामिल नहीं हुए, जिसके कारण एजेंसी के पास उन्हें हिरासत में लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

अदालत ने यह भी खारिज कर दिया था कि समन का जवाब देना जांच में सहयोग के समान है। पीठ ने कहा था कि जांच एजेंसियाँ किसी व्यक्ति की सुविधा या निर्देश के अनुसार काम नहीं कर सकतीं। चुनाव से ठीक पहले गिरफ्तारी के तर्क पर भी अदालत ने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति खुद जांच में देरी करता है, तो वह बाद में दुर्भावना का आधार लेकर गिरफ्तारी के समय पर सवाल नहीं उठा सकता।