Breaking News in Hindi

पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का राज्यसभा कार्यकाल खत्म

छह साल में सिर्फ एक बहस में भाग लिया

  • खुद ही कहा पेशेवर राजनेता नहीं हैं

  • एक भी सवाल नहीं पूछा कार्यकाल में

  • उपस्थिति भी औसत से काफी कम रही

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का राज्यसभा में छह साल का कार्यकाल समाप्त हो गया है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, उनका संसदीय रिपोर्ट कार्ड चर्चा का विषय बना हुआ है। अपने पूरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने सदन में शून्य प्रश्न पूछे, शून्य निजी विधेयक पेश किए और केवल एक बहस में हिस्सा लिया।

जस्टिस गोगोई की औसत उपस्थिति लगभग 53 प्रतिशत रही, जो राज्यसभा सांसदों के 80 प्रतिशत के औसत से काफी कम है। जहां एक औसत सांसद लगभग 144 बहसों में हिस्सा लेता है, वहीं गोगोई ने मार्च 2020 में मनोनीत होने के तीन साल बाद अगस्त 2023 में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक पर अपना पहला और एकमात्र भाषण दिया। इस दौरान उन्होंने विधेयक का समर्थन करते हुए इसे संवैधानिक रूप से वैध बताया था।

अपनी कम भागीदारी पर सफाई देते हुए रंजन गोगोई ने कहा कि वह एक पेशेवर राजनीतिज्ञ नहीं हैं, जिन्हें राजनीतिक करियर बनाने के लिए सदन में दिखावा करने की जरूरत हो। उन्होंने सदन में होने वाले हंगामे और व्यवधानों को अपनी कम उपस्थिति और मौन का मुख्य कारण बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने केवल प्रश्न पूछने के लिए प्रश्न नहीं पूछे।

गोगोई ने सदन के भीतर अपनी सक्रियता के बजाय अन्य योगदानों पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ कॉन्स्टिट्यूशनल एंड पार्लियामेंट्री स्टडीज के तत्वावधान में विदेशी प्रतिनिधिमंडलों, मिशन प्रमुखों और दिल्ली पुलिस के कर्मियों को संविधान के विकास और नए आपराधिक कानूनों जैसे विषयों पर संबोधित किया है।

नवंबर 2019 में अयोध्या विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाने वाली पीठ की अध्यक्षता करने के छह महीने बाद ही उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था। वह राज्यसभा में मनोनीत होने वाले देश के पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीश बने। अपनी आत्मकथा जस्टिस फॉर द जज में उन्होंने लिखा था कि उन्होंने यह नामांकन इसलिए स्वीकार किया ताकि वह न्यायपालिका और पूर्वोत्तर भारत के मुद्दों को विधियिका के सामने रख सकें। हालांकि, आंकड़ों के अनुसार सदन के पटल पर इन मुद्दों पर उनकी सक्रियता सीमित ही रही।