सोनम वांगचुक मामले की सुनवाई अब 26 को
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सीधे जेल अधीक्षको को दिया निर्देश
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एनएसए के तहत जोधपुर जेल में हैं
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संवैधानिक अधिकार का मामला बन गया
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने लद्दाख के प्रमुख जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक की हिरासत से जुड़े मामले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने जोधपुर जेल अधीक्षक को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह उस पेनड्राइव को सीलबंद कवर में अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें, जो 29 सितंबर, 2025 को हिरासत के दौरान केंद्र सरकार के अधिकारियों द्वारा वांगचुक को दी गई थी। इससे साफ हो गया है कि वांगचुक की गिरफ्तारी के बारे में केंद्र सरकार ने जो दलीलें दी हैं, उस पर सुप्रीम कोर्ट भरोसा नहीं कर पाया है।
यह कानूनी विवाद तब और गहरा गया जब सोनम वांगचुक की पत्नी, डॉ. गीतांजलि अंगमो ने उनकी हिरासत को अवैध बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उनकी ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार द्वारा वांगचुक के भाषणों का जो लिखित विवरण न्यायालय में पेश किया गया है, वह संदिग्ध है। सिब्बल ने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा प्रस्तुत शब्दों और वांगचुक द्वारा वास्तव में दिए गए भाषणों के बीच भारी विसंगतियां हैं।
न्यायालय ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार द्वारा तैयार की गई ट्रांसक्रिप्ट की सटीकता पर संदेह व्यक्त किया। न्यायमूर्ति की पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि बिना मूल साक्ष्य (पेनड्राइव) को देखे, केवल सरकारी दस्तावेजों के आधार पर किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का फैसला नहीं किया जा सकता।
आज फिर इस मामले में पुनः सुनवाई हुई। न्यायालय ने डॉ. गीतांजलि जे. अंगमो की याचिका पर सुनवाई को अब 26 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दिया है। गौरतलब है कि वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में रखा गया है, जिसे याचिकाकर्ता ने पूरी तरह असंवैधानिक और राजनीति से प्रेरित बताया है।
अदालत का पेनड्राइव को सीधे जेल अधीक्षक से मंगाने का निर्णय यह संकेत देता है कि न्यायपालिका साक्ष्यों के साथ किसी भी संभावित छेड़छाड़ या विभागीय हस्तक्षेप को रोकना चाहती है। यह मामला अब एक संवैधानिक प्रश्न बन गया है कि क्या शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक मांगों और भाषणों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानकर एनएसए जैसे कठोर कानून लगाए जा सकते हैं?
बचाव पक्ष का दावा है कि उस पेनड्राइव में ऐसे तथ्य या वीडियो संदेश हो सकते हैं जो केंद्र सरकार के दावों की पोल खोल सकते हैं। यही कारण है कि अदालत ने इसे सीलबंद कवर में पेश करने का आदेश दिया है ताकि इसकी गोपनीयता और अखंडता बनी रहे। आगामी 26 फरवरी की सुनवाई इस मामले में निर्णायक साबित हो सकती है। यदि पेनड्राइव में मौजूद सामग्री और सरकार द्वारा पेश की गई ट्रांसक्रिप्ट में कोई विरोधाभास पाया जाता है, तो यह न केवल वांगचुक की रिहाई का मार्ग प्रशस्त करेगा, बल्कि हिरासत में लेने वाली एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा।