श्रीलंका से भारत के लिए सबक
पड़ोसी देश श्रीलंका से हाल ही में आई एक खबर ने न केवल दक्षिण एशिया, बल्कि दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों का ध्यान खींचा है। श्रीलंका की संसद ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित कर सांसदों और उनकी विधवाओं को मिलने वाली पेंशन को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। यह निर्णय कोई सामान्य प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि उस पेंशन संस्कृति पर एक कड़ा प्रहार है जिसने राजनीति को एक सेवा के बजाय सुरक्षित निवेश में बदल दिया था।
आर्थिक कंगाली और जन-आक्रोश के बीच श्रीलंका ने जो रास्ता चुना है, वह भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए एक गंभीर आत्मचिंतन का विषय होना चाहिए। श्रीलंका ने 1977 के उस संसदीय पेंशन अधिनियम को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत मात्र 5 साल सेवा करने पर सांसद आजीवन पेंशन के हकदार हो जाते थे।
राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके के नेतृत्व वाली सरकार ने अपने चुनावी वादे को पूरा करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि जब देश की आम जनता आर्थिक बोझ तले दबी हो, तो जनप्रतिनिधियों को राजकोष से अतिरिक्त सुख भोगने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। यह कदम साझा दुख और साझा त्याग की उस अवधारणा को पुष्ट करता है, जो किसी भी लोकतंत्र की नींव होनी चाहिए।
श्रीलंका के इस साहसिक कदम की तुलना में यदि भारत की स्थिति पर नजर डालें, तो तस्वीर काफी चिंताजनक नजर आती है। भारत में एक सांसद का वेतन और भत्ते समय-समय पर मुद्रास्फीति के आधार पर बढ़ते रहे हैं। 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, एक पूर्व सांसद को न्यूनतम 31,000 प्रति माह की पेंशन मिलती है।
यदि वह व्यक्ति कई बार निर्वाचित हुआ है, तो प्रत्येक अतिरिक्त कार्यकाल के साथ यह राशि बढ़ती जाती है। विडंबना यह है कि भारत में मल्टी-पेंशन की व्यवस्था है। यदि कोई व्यक्ति पहले विधायक रहा और फिर सांसद बना, तो वह दोनों पदों की पेंशन का लाभ एक साथ उठा सकता है। कई राज्यों में तो विधायक जितनी बार चुनाव जीतते हैं, उतनी बार उनकी पेंशन राशि में इजाफा होता है।
एक ओर देश का आम नागरिक दशकों तक सेवा करने के बाद भी एक सम्मानजनक पेंशन के लिए संघर्ष करता है, वहीं दूसरी ओर मात्र 5 साल के कार्यकाल के बाद राजनेताओं को मिलने वाला यह आजीवन उपहार सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर सवालिया निशान खड़ा करता है। भारत में सांसदों और विधायकों की पेंशन पर होने वाला खर्च प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये में है।
एक ओर सरकारें राजकोषीय घाटे का हवाला देकर पुरानी पेंशन योजना को लागू करने से कतराती हैं और अग्निवीर जैसी योजनाओं के माध्यम से पेंशन के बोझ को कम करने की कोशिश करती हैं, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों की पेंशन और सुविधाओं पर कोई लगाम नहीं लगाई जाती। जरा सोचिए, एक सामान्य सरकारी कर्मचारी 30-35 साल की सेवा के बाद जिस पेंशन का हकदार होता है, क्या उसकी तुलना 5 साल के विधायी कार्यकाल से की जा सकती है?
जब देश का गरीब व्यक्ति 600 या 1,000 रुपये की वृद्धावस्था पेंशन के लिए कतारों में खड़ा होता है, तब पूर्व सांसदों और विधायकों को मिलने वाली लाखों की पेंशन और मुफ्त हवाई यात्रा, रेल यात्रा एवं चिकित्सा जैसी सुविधाएं एक नया कुलीन वर्ग पैदा करती हैं। अक्सर तर्क दिया जाता है कि सांसदों को सेवानिवृत्ति के बाद वित्तीय सुरक्षा की आवश्यकता होती है ताकि वे भ्रष्टाचार की ओर प्रवृत्त न हों।
लेकिन क्या यह तर्क केवल नेताओं पर लागू होता है? क्या देश का किसान, मजदूर और मध्यमवर्गीय कर्मचारी वित्तीय सुरक्षा का हकदार नहीं है? श्रीलंका ने यह साबित किया है कि कानून नैतिकता से ऊपर नहीं हो सकता। राजनीति को लोकसेवा कहा जाता है, लेकिन जब यह सेवा सरकारी खजाने पर बोझ बनने लगे, तो इसका स्वरूप बदल जाता है।
श्रीलंका के जनप्रतिनिधियों ने अपनी पेंशन पर कैंची चलाकर यह संदेश दिया है कि वे जनता के स्वामी नहीं, बल्कि उनके प्रतिनिधि हैं। भारत में भी पंजाब जैसी कुछ राज्य सरकारों ने एक विधायक-एक पेंशन का नियम लागू कर सुधार की दिशा में कदम बढ़ाया है, लेकिन यह नाकाफी है। श्रीलंका की तरह क्या भारत के सांसद भी यह साहस दिखा पाएंगे कि वे अपनी सुविधाओं में कटौती कर देश के राजकोष को मजबूती प्रदान करें?
यदि भारत वास्तव में विकसित भारत बनने की ओर अग्रसर है, तो उसे अपनी नीतियों में उस भेदभाव को समाप्त करना होगा जो खास और आम के बीच की खाई को बढ़ाता है। सांसदों और विधायकों की पेंशन का अंत केवल आर्थिक बचत का मामला नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र में जनता के विश्वास को बहाल करने का एक सशक्त माध्यम है। अब देखना है कि नैतिकता की दुहाई देने वाले अपना हित छोड़ने पर कब एकमत हो पाते हैं या उनका यह पाखंड आगे भी जनता की जेब पर बोझ बना रहेगा।