Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
अत्यधिक ताप सहने वाला नया चिप तैयार Bengal Election 2026: ममता बनर्जी को बड़ा झटका, इस सीट से TMC उम्मीदवार का नामांकन रद्द; जानें अब कि... Mathura Boat Accident Video: मौत से चंद लम्हे पहले 'राधे-राधे' का जाप कर रहे थे श्रद्धालु, सामने आया... पाकिस्तान: इस्लामाबाद में अघोषित कर्फ्यू! ईरान-यूएस पीस टॉक के चलते सुरक्षा सख्त, आम जनता के लिए बुन... Anant Ambani Guruvayur Visit: अनंत अंबानी ने गुरुवायुर मंदिर में किया करोड़ों का दान, हाथियों के लिए... पश्चिम बंगाल चुनाव: बीजेपी का बड़ा दांव! जेल से रिहा होते ही मैदान में उतरा दिग्गज नेता, समर्थकों ने... Nashik News: नासिक की आईटी कंपनी में महिलाओं से दरिंदगी, 'लेडी सिंघम' ने भेष बदलकर किया बड़े गिरोह क... EVM Probe: बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पहली बार दिया EVM जांच का आदेश; जानें मुंबई विधानसभा ... Rajnath Singh on Gen Z: 'आप लेटेस्ट और बेस्ट हैं', रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने Gen Z की तारीफ में पढ... SC on Caste Census: जाति जनगणना पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, याचिकाकर्ता को फटकार लगा CJI...

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट बनाम डोनाल्ड ट्रंप से माहौल गर्म

टैरिफ शक्तियों पर कानूनी संघर्ष तेज होगा

वाशिंगटन डी.सी.: संयुक्त राज्य अमेरिका आज एक गंभीर संवैधानिक संकट के मुहाने पर खड़ा हो गया है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसले में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उन कार्यकारी शक्तियों को सीमित कर दिया है, जिनका उपयोग वे एकतरफा तरीके से विदेशी आयातों पर भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने के लिए करते रहे हैं।

इस फैसले ने न केवल अमेरिका फर्स्ट नीति की आर्थिक दिशा बदल दी है, बल्कि सत्ता के पृथक्करण पर एक नई बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से यह निर्णय सुनाया कि संविधान के अनुच्छेद 1 के तहत, कर लगाने और व्यापार को विनियमित करने की प्राथमिक शक्ति अमेरिकी कांग्रेस (संसद) के पास है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अनिश्चितकाल तक व्यापक टैरिफ नहीं थोप सकते, क्योंकि इसका सीधा बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है।

न्यायालय के इस रुख का अर्थ है कि अब किसी भी बड़े व्यापारिक शुल्क को लागू करने के लिए राष्ट्रपति को सांसदों की आधिकारिक मंजूरी लेनी होगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला राष्ट्रपति की कार्यकारी आदेशों के जरिए शासन करने की प्रवृत्ति पर एक बड़ी न्यायिक चोट है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस अदालती आदेश पर अपनी चिर-परिचित शैली में कड़ा प्रहार किया है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के माध्यम से उन्होंने इस फैसले को अमेरिका के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताया। ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि वैश्विक व्यापारिक युद्ध में त्वरित निर्णय लेने के लिए राष्ट्रपति के पास पूर्ण अधिकार होने चाहिए। व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार, प्रशासन इस बात से चिंतित है कि अब चीन और यूरोपीय संघ जैसे प्रतिस्पर्धी देश इस कानूनी बाधा का फायदा उठाकर अमेरिका के साथ व्यापारिक मोलभाव में बढ़त हासिल कर सकते हैं।

इस फैसले के बाद वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल है। विपक्षी दलों ने इस निर्णय का स्वागत किया है। उन्होंने इसे तानाशाही प्रवृत्तियों पर लोकतंत्र की जीत बताते हुए कहा कि आर्थिक नीतियां किसी एक व्यक्ति की सनक पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चर्चा पर आधारित होनी चाहिए। वॉल स्ट्रीट पर इस खबर का मिश्रित असर दिखा। जहाँ रिटेल और टेक सेक्टर (जो आयात पर निर्भर हैं) ने राहत की सांस ली है, वहीं घरेलू विनिर्माण क्षेत्र में अनिश्चितता के कारण गिरावट देखी गई।

विशेषज्ञों की राय में, यह केवल एक व्यापारिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच एक लंबे कानूनी युद्ध की शुरुआत हो सकती है। यदि ट्रंप प्रशासन इस फैसले को पलटने के लिए नए विधायी रास्ते तलाशता है, तो अमेरिका में शक्तियों के संतुलन को लेकर एक अभूतपूर्व गतिरोध पैदा हो सकता है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कांग्रेस इस नई जिम्मेदारी को संभालने के लिए तैयार है या यह व्यापार नीति में लंबे गतिरोध का कारण बनेगा।