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लंदन की उच्च अदालत ने सरकार का आदेश रद्द किया

फिलिस्तीन एक्शन पर प्रतिबंध को अवैध बताया

लंदनः लंदन की उच्च अदालत द्वारा हाल ही में सुनाया गया यह निर्णय न केवल ब्रिटेन की राजनीति, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों के दृष्टिकोण से भी एक ऐतिहासिक मिसाल माना जा रहा है। ब्रिटिश सरकार द्वारा फिलिस्तीन एक्शन समूह पर लगाए गए प्रतिबंध को रद्द करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संघर्ष में एक बड़ा मोड़ है।

लंदन की उच्च अदालत के न्यायाधीशों ने ब्रिटिश सरकार के उस गृह मंत्रालय के आदेश की बारीकी से समीक्षा की, जिसमें फिलिस्तीन एक्शन को एक प्रतिबंधित संगठन घोषित किया गया था। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी समूह पर प्रतिबंध लगाना एक अंतिम और कठोरतम विकल्प होना चाहिए।

अदालत ने पाया कि सरकार की कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। न्यायाधीशों के अनुसार, लोकतंत्र में असहमति की आवाज को दबाने के लिए प्रतिबंधों का उपयोग नहीं किया जा सकता, जब तक कि वह समूह सीधे तौर पर आतंकवाद या सार्वजनिक संहार में शामिल न हो।

सुनवाई के दौरान, ब्रिटिश सरकार के वकीलों ने तर्क दिया था कि फिलिस्तीन एक्शन समूह सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाता है। सरकार ने विशेष रूप से उन घटनाओं का हवाला दिया जहाँ समूह के कार्यकर्ताओं ने हथियार बनाने वाली कंपनियों के कार्यालयों पर लाल रंग फेंका था या उनकी कार्यप्रणाली में बाधा डाली थी। सरकार का दावा था कि यह समूह सार्वजनिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है।

हालाँकि, अदालत ने सरकार की इन दलीलों को अपर्याप्त पाया। न्यायाधीशों ने टिप्पणी की कि यदि कोई व्यक्ति या समूह संपत्ति को नुकसान पहुँचाता है, तो उसके लिए देश के आपराधिक कानूनों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए, न कि पूरे संगठन को ही प्रतिबंधित घोषित कर देना चाहिए। अदालत ने रेखांकित किया कि प्रतिबंध लगाने के लिए आवश्यक आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता के ठोस सबूत सरकार पेश करने में विफल रही।

इस फैसले के आते ही मानवाधिकार संगठनों और नागरिक स्वतंत्रता के पैरोकारों के बीच खुशी की लहर दौड़ गई। इसे सत्य और न्याय की जीत बताया जा रहा है। लंदन की सड़कों पर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी इकट्ठा हुए, जिन्होंने झंडे लहराकर और नारे लगाकर इस ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत किया। कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह फैसला उन अन्य समूहों के लिए भी सुरक्षा कवच का काम करेगा जो शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज बुलंद करते हैं।

अदालती झटके के बावजूद, ब्रिटिश गृह मंत्रालय ने झुकने के संकेत नहीं दिए हैं। मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने संकेत दिया है कि वे इस फैसले के कानूनी पहलुओं का अध्ययन कर रहे हैं और जल्द ही इसके खिलाफ अपील दायर कर सकते हैं। सरकार का मानना है कि इस तरह के समूहों को छूट देने से भविष्य में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना कठिन हो सकता है। यह मामला अब ब्रिटेन की संसद में भी चर्चा का विषय बनने की संभावना है, क्योंकि यह सीधे तौर पर पब्लिक ऑर्डर एक्ट और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच के संतुलन को प्रभावित करता है।