शायद यह बदलाव भी जलवायु परिवर्तन का चेहरा है
कोपेनहेगेनः अंटार्कटिक प्रायद्वीप से पिछले 12 घंटों के भीतर प्राप्त उपग्रह चित्रों और वैज्ञानिक रिपोर्टों ने वैश्विक जलवायु विशेषज्ञों के बीच खतरे की घंटी बजा दी है। बर्फीले रेगिस्तान के रूप में जाने जाने वाले इस महाद्वीप का एक विशाल हिस्सा अब सफेद के बजाय चमकीले गुलाबी या तरबूज जैसे लाल रंग में बदल गया है। पहली नजर में यह दृश्य जितना आकर्षक और सुंदर लगता है, वैज्ञानिक दृष्टि से यह उतना ही विनाशकारी संकेत है।
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यह घटना क्लैमाइडोमोनस निवालिस नामक एक सूक्ष्म शैवाल के कारण होती है। हालांकि यह एक हरा शैवाल है, लेकिन इसमें कैरोटीनॉयड नामक लाल रंग का पिगमेंट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह पिगमेंट शैवाल को अत्यधिक पराबैंगनी किरणों से बचाता है। सर्दियों के दौरान यह शैवाल बर्फ के नीचे सुप्त अवस्था में रहता है, लेकिन जैसे ही तापमान बढ़ता है और बर्फ की ऊपरी परत पिघलनी शुरू होती है, इसे आवश्यक नमी और पोषक तत्व मिलते हैं और यह तेजी से फैलने लगता है।
पिछले 12 घंटों में दर्ज किए गए आंकड़े बताते हैं कि अंटार्कटिक प्रायद्वीप के कुछ हिस्सों में तापमान सामान्य औसत से 4 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है। वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चिंता अल्बेडो इफेक्ट को लेकर है। शुद्ध सफेद बर्फ सूर्य की रोशनी के लगभग 80-90 फीसद हिस्से को परावर्तित कर वापस अंतरिक्ष में भेज देती है, जिससे धरती का तापमान नियंत्रित रहता है। लेकिन जब बर्फ गुलाबी हो जाती है, तो इसकी परावर्तित करने की क्षमता कम हो जाती है। गहरा रंग होने के कारण गुलाबी बर्फ सूरज की गर्मी को सोखने लगती है।
गर्मी सोखने की इस प्रक्रिया से बर्फ और भी तेजी से पिघलती है, जिससे शैवाल को पनपने के लिए और अधिक पानी मिलता है। यह एक जानलेवा चक्र बन जाता है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यदि यह गुलाबी फैलाव इसी गति से जारी रहा, तो अंटार्कटिका की नाजुक ग्लेशियर प्रणालियां अपनी स्थिरता खो सकती हैं। पिछले 12 घंटों की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि बर्फ पिघलने की दर में 15 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। अगर बड़े पैमाने पर ग्लेशियर पिघलते हैं, तो वैश्विक समुद्र स्तर में वृद्धि होना अनिवार्य है, जिससे दुनिया भर के तटीय शहरों पर डूबने का खतरा मंडराने लगेगा। यह पिंक स्नो प्रकृति की वह खामोश चीख है जिसे दुनिया को अब अनदेखा नहीं करना चाहिए।